CAA: SC says, no stop without listening to the center, govt should reply in four weeks | CAA: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केन्द्र को सुने बगैर रोक नहीं, सरकार चार सप्ताह में दे जवाब
सुप्रीम कोर्ट की इमारत। (फाइल फोटो)

Highlightsउच्चतम न्यायालय ने बुधवार को स्पष्ट किया कि केन्द्र का पक्ष सुने बगैर संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के क्रियान्वयन पर रोक नहीं लगायी जायेगी। न्यायालय ने कहा कि इस कानून की वैधता के बारे में पांच सदस्यीय संविधान पीठ फैसला करेगी।

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को स्पष्ट किया कि केन्द्र का पक्ष सुने बगैर संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के क्रियान्वयन पर रोक नहीं लगायी जायेगी। न्यायालय ने कहा कि इस कानून की वैधता के बारे में पांच सदस्यीय संविधान पीठ फैसला करेगी।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाओं पर जवाब देने के लिये केन्द्र को चार सप्ताह का वक्त देने के साथ ही सभी उच्च न्यायालयों को इस मामले पर फैसला होने तक सीएए को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करने से रोक दिया।

पीठ ने कहा, ‘‘हम अंतरिम राहत के मुद्दे पर केन्द्र को सुने बगैर कोई एक पक्षीय आदेश नहीं दे रहे हैं।’’ शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप का पुरजोर अनुरोध किया।

इन वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने न्यायालय में लंबित इस मामले में फैसला होने तक नागरिकता संशोधन कानून के क्रियान्वयन और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर कार्यक्रम की प्रक्रिया कुछ समय तक स्थगित करने का आदेश देने का भी अनुरोध किया।

केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल और सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं के इस अनुरोध का पुरजोर विरोध किया। पीठ ने इस विरोध का संज्ञान लेते हुये टिप्पणी की, ‘‘सरकार के अनुसार यह राहत कानून पर रोक लगाने जैसी ही है।’’ पीठ ने कहा, ‘‘हम सभी के दिमाग में यह मामला सर्वोपरि है। हम पांच न्यायाधीशों की पीठ गठित करेंगे और फिर मामला सूचीबद्ध करेंगे। उन सभी याचिकाओं पर नोटिस जारी किया जाये जिनमें ऐसा नहीं हुआ था। अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल जवाब दाखिल करने के लिये चार सप्ताह का वक्त चाहते हैं।’’

पीठ ने कहा कि सीएए को लेकर दायर याचिकाओं की सुनवाई के तरीके के बारे में निर्णय करने के लिये न्यायालय कुछ याचिकाओं को चैंबर में सुनेगा और इसके बाद चार सप्ताह बाद रोजाना सुनवाई के लिये पांच सदस्यीय पीठ गठित होगी।

कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया जाये और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर कार्यक्रम कुछ महीने के लिये स्थगित कर दिया जाये। उन्होंने सीएए के क्रियान्वयन को भी स्थगित रखने का अनुरोध पीठ से किया।

इस पर पीठ ने कहा, ‘‘हम भी सोचते हैं कि इस मामले की संविधान पीठ द्वारा सुनवाई की जानी चाहिए।’’ वेणुगोपाल ने कहा कि इस मामले में 18 दिसंबर की सुनवाई के बाद न्यायालय ने 60 मामलों में केन्द्र को नोटिस जारी किये थे लेकिन इसके बाद 83 नयी याचिकाएं दायर की गयी हैं और इनमें से अधिकांश की प्रतियां उन्हें नहीं दी गयी हैं।

अटार्नी जनरल ने कहा, ‘‘हमें इन याचिकाओं पर जवाब दाखिल करना है और जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिये छह सप्ताह का समय दिया जाना चाहिए।’’

बांग्लादेश से असम और त्रिपुरा आने वाले 40 लाख बंगाली हिन्दुओं को नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता प्रदान करने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि यह कानून विचित्र स्थिति पैदा करेगा और पहले से ही इन राज्यों में जबर्दस्त आन्दोलन चल रहा है। उन्होंने कहा कि इस कानून के क्रियान्वयन पर रोक लगायी जाये क्योंकि यह 1985 के असम समझौते का भी उल्लंघन करता है जिसमें नागरिकता प्रदान करने की तारीख 24 मार्च 1971 निर्धारित की गयी थी।

अटार्नी जनरल ने इसमें हस्तक्षेप किया और न्यायालय से अनुरोध किया कि असम से संबंधित याचिकाओं पर नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं से अलग सुनवाई करनी चाहिए। उन्होंने न्यायालय को भरोसा दिलाया कि असम राष्ट्रीय नागरिक पंजी की कवायद भारत के महापंजीयक द्वारा राष्ट्रीय सूची प्रकाशित किये जाने तक पूरी नहीं होगी।

पीठ ने कहा कि त्रिपुरा और असम से संबंधित याचिकाएं तथा नियम तैयार हुये बगैर ही सीएए को लागू कर रहे उप्र से संबंधित मामले पर अलग से विचार किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि असम समस्या देश के अन्य हिस्सों से भिन्न है क्योंकि असम में नागरिकता के लिये पहले कटऑफ की तारीख 24 मार्च, 1971 थी और सीएए के तहत इसे बढ़ाकर 31 दिसंबर, 2014 तक कर दिया गया है।

इस कानून के खिलाफ याचिका दायर करने वाले कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के वी विश्वनाथन ने कहा, ‘‘कानून के क्रियान्वयन को स्थगित किया जाये क्योंकि अल्पसंख्यको में इसे लेकर आशंका व्याप्त है और बहुसंख्यकों में भी पीड़ा है।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि उप्र सरकार ने हाल ही में करीब 40,000 लोगों को नागरिकता प्रदान करने की सिफारिश केन्द्र से की है। उन्होंने कहा, ‘‘उप्र के 19 जिलों में लोगों को ‘संदिग्ध नागरिक’ के रूप में चिन्हित किया जा रहा है जो आवाम में यह भय पैदा कर रहा है कि उनके नाम मतदाता सूचियों से बाहर कर दिये जायेंगे।’’

सिंघवी ने कहा, ‘‘उप्र सरकार इस कानून के तहत नियमों की अधिसूचना के बगैर ही आगे कार्यवाही कर रही है। इस प्रक्रिया को कुछ समय के लिये स्थगित किया जाना चाहिए और इससे कोई बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। जो चीजें 70 साल में नहीं हुयीं उन्हें 20 महीने में शुरू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

नागरिकता संशोधन कानून में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से 31 दिसंबर, 2014 तक देश में आये हिन्दू, सिख, बौद्ध, ईसाई, जैन और पारसी समुदाय के सदस्यों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद से पारित नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को 12 दिसंबर को अपनी संस्तुति प्रदान की थी।

राष्ट्रपति की संस्तुति के साथ ही यह कानून बन गया था और यह 10 जनवरी को जारी अधिसूचना के बाद देश में लागू हो गया है। सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये उच्चतम न्यायालय में अनेक याचिकाएं दायर की गयी हैं।

याचिका दायर करने वालों में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, कांग्रेस के सांसद जयराम रमेश, तृणमूल की सांसद महुआ मोइत्रा, राजद के नेता मनोज झा, एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी, आसू, पीस पार्टी , अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा और कानून के अनेक छात्र शामिल हैं।

केरल की माकपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने भी संविधान के अनुच्छेद 131 का इस्तेमाल करते हुये संशोधित नागरिकता कानून, 2019 को चुनौती दी है।

आईयूएमएल ने अपनी याचिका में कहा है कि सीएए समता के अधिकार का उल्लंघन करता है और इसका मकसद धर्म के आधार पर एक वर्ग को अलग रखते हुये अन्य गैरकानूनी शरणार्णियों को नागरिकता प्रदान करना है। 

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