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सोनिया गांधी की वीडियो कांफ्रेंसिंग को भाजपा ने बताया मजाक, बोली- ठाकरे ने मजबूरी में हिस्सा लिया, विपक्षी दलों को नहीं भरोसा

By संतोष ठाकुर | Updated: May 24, 2020 07:12 IST

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) प्रमुख सोनिया गांधी की ओर से एक दिन पहले बुलाई गई वीडियो कांफ्रेंसिंग को भाजपा अपने लिए किसी भी तरह से चिंताजनक नहीं मानती है. उसका कहना है कि जिस तरह से इसमें विपक्षी दलों ने आधे मन से हिस्सा लिया है उससे यह साफ हो गया है कि कांग्रेस कि किसी भी पहल को लेकर विपक्षी दलों को ही भरोसा नहीं है.

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ठळक मुद्देसंयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) प्रमुख सोनिया गांधी की ओर से एक दिन पहले बुलाई गई वीडियो कांफ्रेंसिंग को भाजपा अपने लिए किसी भी तरह से चिंताजनक नहीं मानती है.भाजपा ने कहा कि जिस तरह से इसमें विपक्षी दलों ने आधे मन से हिस्सा लिया है उससे यह साफ हो गया है कि कांग्रेस कि किसी भी पहल को लेकर विपक्षी दलों को ही भरोसा नहीं है.

नई दिल्ली। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) प्रमुख सोनिया गांधी की ओर से एक दिन पहले बुलाई गई वीडियो कांफ्रेंसिंग को भाजपा अपने लिए किसी भी तरह से चिंताजनक नहीं मानती है. उसका कहना है कि जिस तरह से इसमें विपक्षी दलों ने आधे मन से हिस्सा लिया है उससे यह साफ हो गया है कि कांग्रेस कि किसी भी पहल को लेकर विपक्षी दलों को ही भरोसा नहीं है. ऐसे में भाजपा को इस तरह के किसी भी कदम को लेकर कोई चिंता क्यों होनी चाहिए. भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि विपक्षी दलों की एकता के नाम पर वीडियो कांफ्रेंसिंग को बुलाकर कांग्रेस ने अपना मजाक ही उड़ाया है. देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्य उत्तरप्रदेश से ना केवल बहुजन समाज पार्टी ने इससे दूरी बनाकर रखी बल्कि पूर्व में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ चुके सपा ने भी अपने को इस कवायद से दूर रखा. इसकी वजह यह थी कि वह जानते थे कि ऐसा करके कांग्रेस अपने को बड़ा और क्षेत्रीय दलों का नेता साबित करने का प्रयास कर रही है. जबकि जमीन पर उसे क्षेत्रीय दलों का साथ चाहिए. ऐसा नहीं होने पर वह कहीं सही से खड़ी होती हुए भी नहीं दिख पाएगी. इसके साथ ही दक्षिणी राज्यों से भी उसके साथ कोई मजबूती से खड़ा होता नजर नहीं आया.

राजनीतिक मजबूरी के कारण शामिल हुए ठाकरे

बिहार और मध्यप्रदेश मेंं कांग्रेस शून्य है. यहां पर भी उसे कोई साथी नहीं मिल पाया. अगर इस वीडियो कांफ्रेंसिंग में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शामिल होने की बात की जाए तो ठाकरे राजनीतिक मजबूरी की वजह से इसमें शामिल हुए थे. वह जानते हैं कि अगर महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री बने रहना है तो कांग्रेस की इस तरह की कवायद में ना चाहते हुए भी शामिल होना पड़ेगा. लेकिन वह मन से कभी भी कांग्रेस के साथ नहीं जुड़ सकते हैं. विपक्षी मोर्चे की कमान पर घमासान : इसी तरीके से पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच उस समय तक किसी तरह का करार नहीं हो सकता है जब तक की कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अपने को मुख्य भूमिका से हटाकर नेपथ्य में नहीं ले जाते हैं. तृणमूल कांग्रेस का साफ कहना है कि अगर देश में कोई विपक्षी मोर्चा बनेगा तो उसकी कमान दिग्गज नेता शरद पवार के हाथ में होनी चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है तो इसकी कमान ममता बनर्जी को सौंपी जानी चाहिए. यह दोनों ही विकल्प कांग्रेस कभी स्वीकार नहीं करेगी.

कई दल भाजपा के साथ जाना चाहते हैं

भाजपा जानती है कि विपक्ष के जिन दलों ने इसमें शिरकत की है उसमें से कई दल भाजपा के साथ आना चाहते हैं. वह केवल अपना राजनीतिक महत्व बढ़ाने के लिए इस वीडियो कांफ्रेंसिंग में गए थे. यह केवल मोल भाव बढ़ाने की एक पुरानी राजनीतिक कला है. लेकिन अफसोस है कि कांग्रेस इसको समझ नहीं पाई है.

टॅग्स :भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)कांग्रेससोनिया गाँधीउद्धव ठाकरे
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