नई दिल्लीः सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने जमीन के बदले नौकरी मामले में उनके और उनके परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआईआर से संबंधित कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने यादव को निचली अदालत में पेश होने से भी छूट दे दी।
उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े जमीन के बदले नौकरी के मामले में केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की प्राथमिकी को सोमवार को रद्द करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने पूर्व मुख्यमंत्री यादव (77) को सुनवाई के दौरान निचली अदालत में पेश होने से छूट दे दी।
न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह इस बात पर कोई राय नहीं दे रही है कि धारा 17ए पिछली तारीख से लागू होती है या भविष्य में। पीठ ने यादव को सुनवाई के दौरान इस कानूनी मुद्दे को उठाने की स्वतंत्रता दी और कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा पहले मामले को रद्द करने से इनकार करने से उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं जा सकेगा।
टिप्पणियों के साथ अदालत ने यादव की उस याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें उन्होंने 2004 से 2009 के बीच केंद्रीय रेल मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान हुई रेलवे नियुक्तियों से जुड़े भ्रष्टाचार मामले को रद्द करने की मांग की थी। अभियोजन पक्ष की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि धारा 17ए तभी लागू होगी।
जब आरोपी निर्णय लेने वाला या सिफारिश करने वाला प्राधिकारी हो और उनका कहना था कि यादव न तो निर्णय लेने वाले और न ही सिफारिश करने वाले प्राधिकारी थे, इसलिए पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, पीठ ने इस तर्क पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मंत्रालय के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति का अनौपचारिक प्रभाव भी प्रासंगिक हो सकता है।
यादव का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी थी कि धारा 17ए भविष्य में लागू होती है और 2004 से 2009 के बीच के कथित अपराधों पर लागू नहीं होती।
उन्होंने कहा कि आरोप यादव की आधिकारिक भूमिका से जुड़े थे और जांच के चरण में पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी। हालांकि, न्यायालय ने इन तर्कों की वैधता पर विचार करने से इनकार कर दिया और इस मामले को सुनवाई के दौरान तय करने के लिए छोड़ दिया।