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कब शर्मिंदा होंगे अमेरिका और इजराइल?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: April 13, 2026 05:22 IST

युद्धविराम की घोषणा के बाद लेबनान पर हुए हमलों में भी अनेक बच्चों की मौत हुई है, लेकिन उन पर सभी तरफ खामोशी बनी हुई है.

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ठळक मुद्देअमेरिकी हमलों में मारे गए बच्चों की तस्वीरों को हवाई जहाज में रखकर थोपे गए युद्ध का सबसे क्रूर चेहरा दिखाया.फिलिस्तीन में सत्तर हजार लोगों की जान लेने वाला इजराइल अपनी विध्वंसक नीतियों के चलते मानवता के लिए खतरा बन चुका है. अकेले ही मुकाबले में उतर जाता था, लेकिन इस बार उसका अमेरिका ने साथ देकर विश्व को गलत संदेश दिया है.

पाकिस्तान में तथाकथित बेनतीजा वार्ता के बाद अमेरिका की फजीहत हो गई है. दूसरी ओर ईरान के साथ युद्ध को लेकर नई चर्चाएं आरंभ हुई हैं. बातचीत के पहले अपने पक्ष में माहौल बनाने वाले दुनिया के स्वयंभू चौधरी को ईरान ने पहले ही आईना दिखा दिया था. उसने अमेरिकी हमलों में मारे गए बच्चों की तस्वीरों को हवाई जहाज में रखकर थोपे गए युद्ध का सबसे क्रूर चेहरा दिखाया.

हालांकि युद्धविराम की घोषणा के बाद लेबनान पर हुए हमलों में भी अनेक बच्चों की मौत हुई है, लेकिन उन पर सभी तरफ खामोशी बनी हुई है. फिलिस्तीन में सत्तर हजार लोगों की जान लेने वाला इजराइल अपनी विध्वंसक नीतियों के चलते मानवता के लिए खतरा बन चुका है. पहले वह अकेले ही मुकाबले में उतर जाता था, लेकिन इस बार उसका अमेरिका ने साथ देकर विश्व को गलत संदेश दिया है.

वहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने की बात, पाकिस्तान-भारत की लड़ाई रुकवाने का दावा और शांति के नोबल का ख्वाब देखने वाला अमेरिका बच्चों के स्कूलों पर बम गिराता है. युद्धविराम के बावजूद अपने समर्थक इजराजल को हमले करने से नहीं रोकता है. वह युद्ध को रोकने की कोशिश सिर्फ इसलिए करता है कि होर्मुज से विश्व व्यापार प्रभावित है जिससे अनेक देश उसके खिलाफ हो चले हैं.

वह हमले अपनी शर्तों पर रोकना चाहता है. उसे वेनेजुएला की तरह समूचा विश्व दिखता है, जिस पर कब्जा कर वह अपना शासन थोपना चाहता है. ईरान ने उसका भ्रम तोड़ा है. हालांकि वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान तक उसे कभी सफलता नहीं मिली है, लेकिन उसने कभी इतिहास से सीखा नहीं है. वर्तमान समय में अमेरिका से दोस्ती और सैनिक अड्डों के चलते खाड़ी देशों को नुकसान उठाना पड़ा है.

अमेरिका को लगता था कि करों के चलते दुनिया उसका साथ देने पर मजबूर होगी. किंतु मानवीय दृष्टिकोण और अपने-अपने हितों की चिंता में किसी ने उसका साथ नहीं दिया. यहां तक कि उसकी जेब में रहने वाले नाटो देशों तक ने किनारा कर लिया. अब भयावह मंजर के बीच बातचीत की शुरुआत हुई है.

जैसा कि माना जा रहा था कि कुछ मामलों पर सहमति बनेगी, लेकिन अतार्किक ढंग से आरंभ वार्ता से परिणामों की उम्मीद नहीं की जा सकती है. ईरान ने मानवता की बात को सबसे पहले दुनिया के सामने रखा और अमेरिका ने पराजित योद्धा की तरह खिसियाहट को दिखा कर कुछ ऐसी मांगें रखी हैं कि जो किसी सम्प्रभु राष्ट्र के लिए पूरा करना संभव नहीं है.

परमाणु मुद्दे पर ईरान बार-बार कह चुका है कि वह और उसके सर्वोच्च नेता उस दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं. किंतु बच्चों सहित युद्ध से हुए विनाश को लेकर ईरान के उठाए सवालों का कोई जवाब नहीं देना चाहता है. यहां तक कि बच्चों की मौत पर अमेरिका और इजराइल को शर्मिंदगी तक महसूस नहीं होती है. अच्छा यह होता कि न पूरी होने वाली मांगों को लेकर होने वाली चर्चा के बाद कम से कम निर्दोष लोगों की मौत पर थोड़ा अफसोस जता दिया जाता, जिससे दुनिया को एक अच्छा संदेश चला जाता. 

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