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भारत में कैसे लौटे ‘शून्य कचरा’ की परंपरा ?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 9, 2026 07:45 IST

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय और एमओईएफसीसी समेत सभी संबंधित मंत्रालयों को कचरा-प्रसंस्करण उपकरणों के लिए घरेलू नवाचार, परीक्षण और विनिर्माण में मदद देनी चाहिए.  

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प्रियंका सिंह

दुनिया में सतत विकास पर चर्चा शुरू होने से कहीं पहले से भारतीय परिवार रोजमर्रा की जिंदगी में ‘शून्य-कचरा’ सिद्धांत मान रहे थे. स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक यह व्यवस्था बनी रही. एक सामान्य भारतीय परिवार डिब्बों और प्लास्टिक पैकेट को साफ कर दोबारा इस्तेमाल करने, कपड़े के झोले लेकर बाजार जाने और कबाड़ को तय व्यक्तियों को बिक्री करने जैसे व्यवहार को मानता था. ये सभी आदतें ‘चक्रीयता’ (सर्कुलैरिटी) की सहज समझ का हिस्सा थीं. अब दस मिनट की डिलीवरी से लेकर स्वच्छता और उत्पाद सुरक्षा के नाम पर पैकेजिंग की कई परतें जुड़ गई हैं. सुविधा आधारित उपभोग संस्कृति के विस्तार से कचरे की मात्रा में अनियंत्रित वृद्धि देखी जा रही है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, देश में कचरा उत्पादन 2017-18 में 99 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन था, जो 2022-23 में 156 ग्राम हो गया. देश में रोजाना लगभग 1.70 लाख टन शहरी ठोस कचरा निकलता है. इसमें से 61 प्रतिशत कचरे का प्रसंस्करण होता है, लगभग 22 प्रतिशत कचरा लैंडफिल में चला जाता है और शेष 17 प्रतिशत का हिसाब नहीं मिल पाता. यही अंतर खुले में कचरा जलाने, इधर-उधर फेंकने या जल निकायों में डालने का कारण बनता है.

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक अध्ययन का आकलन है कि शहरी ठोस कचरे के केवल जैविक हिस्से का प्रसंस्करण 2047 तक 47,500 करोड़ रुपए का वार्षिक बाजार बन सकता है, लगभग 26 लाख पूर्णकालिक समकक्ष नौकरियां और 2.14 लाख करोड़ रुपए का निवेश ला सकता है.

स्वच्छ भारत मिशन जैसे प्रयासों ने ठोस कचरा प्रबंधन को मजबूत बनाया है. लेकिन कुछ सशक्त उपायों को जोड़ने की जरूरत है, जिसमें ये प्राथमिकताएं मदद कर सकती हैं. पहला, कचरे में स्रोत पर कटौती को बढ़ावा देना. उत्पादकों को निचले स्तर के बजाय शुरुआती स्तर पर ही कचरे को घटाने की तरफ ले जाना जरूरी है. उन्हें सिंगल-यूज पैकेजिंग की जगह पर दोबारा भरने और इस्तेमाल करने योग्य पैकेजिंग के साथ उत्पादों की डिजाइन बनाने को प्रोत्साहित करना चाहिए. इसके लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) को करों में छूट, मंजूरी शर्तों में ढील और कचरा कटौती में सफल उद्योगों को मान्यता देने जैसे उपाय जोड़ने चाहिए. दूसरा, थोक कचरा उत्पादकों की संभावित क्षमता का लाभ उठाना.

एक अप्रैल से लागू नए ठोस कचरा प्रबंधन नियम 2026 में थोक कचरा उत्पादकों के लिए अपने स्थान पर कचरा प्रबंधन अनिवार्य बनाया गया है. लेकिन कई उत्पादक जमीन व तकनीकी जानकारी के अभाव और प्रसंस्करण प्रणाली के लिए सीमित वित्तीय संसाधन जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं. इसलिए शहरी स्थानीय निकायों को इन्हें शुरुआती वित्तीय सहायता देनी चाहिए.

तीसरा, कचरा प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों के स्वदेशी विनिर्माण को मजबूत बनाना. भारत में अभी 61 प्रतिशत कचरे का प्रसंस्करण होता है, जिसे बढ़ाने में आयातित मशीनरी पर निर्भरता एक बड़ी बाधा है. खरीद में देरी से प्रसंस्करण सुविधाएं लगाने की रफ्तार धीमी हो जाती है. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय और एमओईएफसीसी समेत सभी संबंधित मंत्रालयों को कचरा-प्रसंस्करण उपकरणों के लिए घरेलू नवाचार, परीक्षण और विनिर्माण में मदद देनी चाहिए.  

भारत चक्रीयता को अपनाने और कचरे में स्रोत पर कटौती पर नए सिरे से ध्यान देकर इस बढ़ती चुनौती को एक आर्थिक अवसर में बदल सकता है, पर्यावरणीय गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार ला सकता है.

टॅग्स :भारतEnvironment Ministry
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