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'नई शिक्षा नीति महत्वाकांक्षी लेकिन क्रियान्वयन पैसे के इंतजाम पर निर्भर', पूर्व शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप ने कही ये बात

By भाषा | Updated: August 2, 2020 11:56 IST

पूर्व शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप इसे महत्वकांक्षी मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि इस नीति का क्रियान्वयन पैसे के इंतजाम पर निर्भर करेगा। वह इस नीति में शिक्षा क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए निजी क्षेत्र की भूमिका को लेकर भी स्पष्टता चाहते हैं।

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ठळक मुद्देनयी शिक्षा नीति की घोषणा के साथ ही इसके पक्ष-विपक्ष में कई तरह की बातें कही जा रही हैं नयी शिक्षा नीति पर विभिन्न पहलुओं को लेकर कई तरह के सवाल सामने आ रहे हैं।

नयी दिल्ली: नयी शिक्षा नीति की घोषणा के साथ ही इसके पक्ष-विपक्ष में कई तरह की बातें कही जा रही हैं और इसके विभिन्न पहलुओं को लेकर कई तरह के सवाल सामने आ रहे हैं। पूर्व शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप इसे महत्वकांक्षी मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि इस नीति का क्रियान्वयन पैसे के इंतजाम पर निर्भर करेगा। वह इस नीति में शिक्षा क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए निजी क्षेत्र की भूमिका को लेकर भी स्पष्टता चाहते हैं। नयी शिक्षा नीति के विभिन्न आयामों पर पेश हैं पूर्व शिक्षा सचिव से ‘भाषा के पांच सवाल’ और उनके जवाब :-

सवाल : नयी शिक्षा नीति पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है। क्या यह शिक्षा संबंधी मूल समस्याओं पर ध्यान देने में सफल है? जवाब : वर्तमान समय में शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों की कमी सबसे गंभीर समस्या है। शिक्षकों को प्रशिक्षण देने वाले अनेक संस्थान माफिया गढ़ बन चुके हैं। शिक्षकों का हुनर कैसे बेहतर किया जाए, यह चुनौती है। इस मुद्दे पर नीति में ध्यान दिया गया है। बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के बारे में भी कई अच्छे प्रावधान किए गए हैं। साथ ही विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए साझा प्रवेश परीक्षा अच्छा विचार है। नयी शिक्षा नीति महत्वकांक्षी है और जमीनी समस्याओं पर गौर करती है लेकिन इस नीति का क्रियान्वयन और सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इसे लागू करने के लिए पैसे का इंतजाम कैसे करती है। ऐसा लगता है कि मान लिया गया है कि बजट का इंतजाम हो जाएगा ।

सवाल : भारत को आज भी गांवों का देश कहा जाता है, जहां शिक्षा में सरकारी स्कूलों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। क्या यह नीति सरकारी स्कूल की व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का खाका पेश करती है? जवाब : शिक्षा की समस्या आधारभूत ढांचे को लेकर कम है और शिक्षकों की उपलब्धता के संबंध में अधिक है। गांवों में आज भी काफी स्थानों पर शिक्षक स्कूल जाते ही नहीं हैं। योग्य शिक्षकों की कमी और चयन प्रक्रिया भी एक समस्या रही है। नयी नीति में शिक्षकों के लिए पेशेवर मानक और शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नया पाठ्यक्रम तैयार करने की बात कही गई है। नयी नीति की एक बड़ी कमी निजी क्षेत्र की भूमिका स्पष्ट न होने से जुड़ी है। ऐसा माना जाता है कि 50 प्रतिशत बच्चे आज भी निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सरकारी स्कूलों की व्यवस्था मतबूत होनी चाहिए लेकिन निजी स्कूलों के महत्व को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। नयी नीति में निजी स्कूलों के बारे में एकाध जगहों पर और सरसरी तौर पर ही उल्लेख किया गया है। शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।

सवाल : वर्तमान में उच्च शिक्षा का मकसद सिर्फ नौकरी हासिल करने तक ही सीमित रह गया है। क्या नयी नीति इस बाधा को तोड़ने में सफल रहेगी? जवाब : मेरा मानना है कि पूरी दुनिया में शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य नौकरी प्राप्त करना है और इसे नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि उच्च कक्षा में छात्रों को अनावश्यक रूप से उन विषयों का अध्ययन करने की जरूरत नहीं हो, जिनमें उनकी रुचि न हो । ऐसे में नौवीं कक्षा से ही व्यावयासिक शिक्षा पर जोर दिए जाने की जरूरत है। बच्चों को परंपरा से हटकर सोच विकसित करनी होगी। उन्हें व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा क्योंकि इसके माध्यम से आजीविका प्राप्त करने के अधिक अवसर मिलते हैं।

सवाल : नयी शिक्षा नीति वर्तमान शैक्षणिक, मूल्यांकन एवं नामांकन व्यवस्था की खामियों को कहां तक दूर कर पाएगी? जवाब : हर वर्ष कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिले को लेकर छात्रों में आपाधापी देखने-सुनने को मिलती है। वर्तमान व्यवस्था में बोर्ड परीक्षा में बढ़ा-चढ़ाकर अंक दे दिए जाते हैं। यहां तक कि भाषा से जुड़े विषयों में शत प्रतिशत अंक मिल जाते हैं। नयी शिक्षा नीति में बोर्ड परीक्षा के प्रारूप में सुधार और दाखिले के लिए साझा प्रवेश परीक्षा आयोजित करने का प्रस्ताव किया गया है। यह अच्छ विचार है। इसी प्रकार से बच्चों के शुरुआती दिनों की शिक्षा काफी मायने रखती है। नयी नीति में प्री-स्कूलिंग के बारे में कई अच्छे प्रावधान हैं। नयी नीति में मूल्यांकन की मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव की बात भी कही गई है।

सवाल : क्या आपको नहीं लगता है कि उच्च शिक्षा में एकल नियामक से इंस्पेक्टर राज की व्यवस्था स्थापित हो सकती है? जवाब : उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एकल नियामक के गठन का विचार काफी अच्छा है। अभी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद जैसे नियामक हैं लेकिन इनके पास नियमन के अलावा भी कई अन्य दायित्व हैं। ऐसे में एकल नियामक की स्थापना से असमंजस और जटिलताएं खत्म होंगी तथा व्यवस्था में और पारदर्शिता आएगी । 

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