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बर्थडे स्पेशल: सलीम-अनारकली की प्रेमकथा को अमर बना दिया था के. आसिफ ने, जानें जीवन से जुड़ी खास बातें

By ऐश्वर्य अवस्थी | Updated: June 14, 2019 12:55 IST

इटावा में जन्मे देश की सबसे ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म बना कर सिने जगत में मकबूल हुए फिल्मकार के. आसिफ का बचपन भले ही मुफलिसी में बीता लेकिन सपने उन्होंने सदैव बड़े ही देखे।

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ठळक मुद्देबॉलीबुड में पहुंचकर बेहतरीन तीन फिल्में बनाकर अपने हुनर का लोहा सभी से मनवा लिया। कमरूद्दीन रखा गया जो वॉलीबुड पहुंचकर के. आसिफ के नाम से मशहूर हुआ।

मशहूर फिल्मकार के. आसिफ का आज जन्मदिन है। बॉलीवुड में फिल्मकार के. आसिफ को एक ऐसी शख्सियत के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने 3 दशक लंबे सिने करियर में अपनी फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर अमिट छाप छोड़ी।के. आसिफ ने अपने सिने करियर में महज 3-4 फिल्मों का निर्माण या निर्देशन किया लेकिन जो भी काम किया, उसे पूरी तबीयत और जुनून के साथ किया। 

इटावा में जन्मे देश की सबसे ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म बना कर सिने जगत में मकबूल हुए फिल्मकार के. आसिफ का बचपन भले ही मुफलिसी में बीता लेकिन सपने उन्होंने सदैव बड़े ही देखे। लिहाजा बॉलीबुड में पहुंचकर बेहतरीन तीन फिल्में बनाकर अपने हुनर का लोहा सभी से मनवा लिया।

इटावा शहर के मोहल्ला कटरा पुर्दल खां में स्थित महफूज अली के घर में उनकी यादें अभी बुजुर्गवारों की जुबां पर हैं, इस घर में के आसिफ के मामा किराए पर रहा करते थे। उनके मामा की पशु अस्पताल में डॉक्टर के रूप में यहां तैनाती हुई थी। उसी दौरान उनकी बहन लाहौर से आकर अपने भाई की सरपरस्ती में रहने लगी थी। उन्होंने 14 जून 1922 को एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम उस समय कमरूद्दीन रखा गया जो वॉलीबुड पहुंचकर के. आसिफ के नाम से मशहूर हुआ।उन्होने फूल बेंचने के साथ इस्लामियां इंटर कालेज से जुड़े मदरसा में शिक्षा ग्रहण की। इस दौरान वे टेलरिंग का कार्य करने लगे, सपनों को साकार करने के लिए वे मुंबई में फिल्मी दुनियां में पहुंच गए।

 1941 में उनकी 'फूल' फिल्म रिलीज हुई जो उस समय की सबसे बड़ी फिल्म मानी गई। इसके पश्चात 1951 में उनकी हलचल फिल्म ने समूचे देश में हलचल मचाई। इसके पश्चात 1960 में मुगल-ए-आजम रिलीज हुई तो इसने फिल्म जगत में तहलका मचा दिया। 

फिल्म जगत की सबसे बेहतरीन फिल्मों में इसका नाम शिलालेख पर दर्ज है। इस फिल्म के निर्माण में 14 साल का समय बीता था, इसी के साथ हर सीन को जीवंत करने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया गया था। के. आसिफ का निधन 9 मार्च 1971 को मुंबई में हुआ। उनकी यादें चंबल में संजोने के लिए चंबल फाउंडेशन के संस्थापक और दस्तावेजी फिल्म निर्माता शाह आलम जी जान से जुटे हुए हैं।

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