Why trade agreement with US could not be achieved? | क्यों नहीं हो पाया अमेरिका से व्यापार समझौता?
क्यों नहीं हो पाया अमेरिका से व्यापार समझौता?

Highlightsभारत और अमेरिका में कोई सहमति नहीं बन पाना अटपटा लगा.अमेरिका के सख्त एवं अड़ियल रवैये के कारण यह समझौता नहीं हो पाया.

अश्विनी महाजन

सितंबर के अंतिम सप्ताह में प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्ना खासी सुर्खियों में रही. ऐसे में एक समाचार सभी को हैरान करने वाला था कि इस दौरान भारत-अमेरिकी व्यापार समझौता नहीं हो पाया. वास्तव में यह कोई विस्तृत व्यापार समझौता न होकर एक सीमित समझौता ही था, उसके बावजूद भारत और अमेरिका में कोई सहमति नहीं बन पाना अटपटा लगा.

कहा जा रहा है कि अमेरिका के सख्त एवं अड़ियल रवैये के कारण यह समझौता नहीं हो पाया. हालांकि भारत के वाणिज्य मंत्नी पीयूष गोयल इस समझौते हेतु अमेरिका में मौजूद थे, लेकिन आम सहमति नहीं बन पाने के कारण उन्हें खाली हाथ ही स्वदेश लौटना पड़ा.

सर्वविदित है कि पिछले कुछ समय से अमेरिका ने चीन और भारत से व्यापार युद्ध छेड़ रखा है. विश्व व्यापार समझौते (डब्ल्यूटीओ) के बावजूद अमेरिका चीन के साथ-साथ भारत से आने वाले उत्पादों पर भी आयात शुल्क बढ़ाता जा रहा है. यहीं नहीं दशकों से भारत से आने वाले कई उत्पादों को प्राथमिकता देते हुए जो शुल्क में रियायत दी जा रही थी, उसे भी समाप्त कर दिया गया. उसके खिलाफ भारत जो अभी तक अमेरिका के आक्रामक रुख को अनदेखा कर रहा था, उसने भी अमेरिका से आ रहे उत्पादों पर शुल्क बढ़ाकर जवाबी कार्यवाही करते हुए अमेरिकी रुख का प्रतिकार किया.

समझौते के लिए जरूरी है कि दोनों पक्षों की मांगों पर आपसी सहमति हो सके. लेकिन अधिकांश मामलों में अमेरिकी अड़ियल रुख अकारण है. हार्ले डेविडसन पर आयात शुल्क घटाना तो तब भी संभव हो सकता है, लेकिन जनस्वास्थ्य को ताक पर रखकर न तो हृदय स्टेंट और घुटनों के इंप्लांट पर कीमत नियंत्नण समाप्त करना संभव है और न ही पेटेंट कानूनों को अमेरिकी इच्छानुसार बदलना. 

मांसाहारी पशुओं के दूध के आयात पर पाबंदी हटाया जाना भी भारतीय मूल्यों और भावनाओं के अनुरूप संभव नहीं है. आज जब हमारे आयात शुल्क पहले से ही काफी कम हैं, उन्हें और घटाना हमारे उद्योगों और कृषि के लिए घातक हो सकता है. जहां तक टेलीकॉम और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों पर आयात शुल्क घटाने का मामला है, उसमें भी कोई रियायत संभव नहीं है. अमेरिका को समझना चाहिए कि यदि भारत यह मांग मान भी जाता है तो भी उसका लाभ चीन को ही मिलेगा.

कुल मिलाकर भारत अमेरिकी राजनयिक संबंधों के मधुर होने के बावजूद, अमेरिकी प्रशासन के कड़े और अनुचित रुख के चलते भारत और अमेरिका के बीच सीमित व्यापार समझौता भी नहीं हो सका. अमेरिका को  भारत की चिंताओं को समझकर अपनी नाजायज मांगों को वापस लेना चाहिए.


Web Title: Why trade agreement with US could not be achieved?
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