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रिश्तों को हैंग कर रहें हैं व्हाट्सऐप और स्मार्टफोन, उलझ गई है जिंदगी

By जोयिता भट्टाचार्या | Updated: June 13, 2018 13:39 IST

फोन ने हमारी जिंदगी को जितना आसान बना दिया है उतना ही उसे उलझा भी दिया है। स्मार्टफोन ने हमारी रोज की जिंदगी से उन छोटी- छोटी खुशियों को छीन लिया है जिन्हें आज हम भूले-भटके कभी याद कर लेते हैं।

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मौजूदा समय में टेक्नोलॉजी ने हमारे रोजमर्रा के जीवन में एक खास जगह ले ली है। टेक्नोलॉजी ने हमारे काम को काफी आसान बना दिया। हर छोटे बड़े काम इसके जरिए झट से कर लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि टेक्नोलॉजी ने आपके रिश्तों की जगह भी ले ली है। लोग टेक्नोलॉजी पर इतने निर्भर ही चुके हैं कि ऐसा लगता है कि अगर कुछ समयस्मार्टफोन के बगैर रहना पड़े तो काम में काफी दिक्कतें आ जाएं।

जहां देखों लोग फोन में बिजी नजर आते हैं। अगर फोन ने हमारी जिंदगी को जितना आसान बना दिया है उतना ही उसे उलझा भी दिया है। स्मार्टफोन ने हमारी रोज की जिंदगी से उन छोटी- छोटी खुशियों को छीन लिया है जिन्हें आज हम भूले-भटके कभी याद कर लेते हैं।

स्मार्टफोन हो या कोई और टेक्नोलॉजी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में इतना ज्यादा समय लेते हैं कि हम खुद के लिए समय नहीं निकाल पाते। मुझे किताबें पढ़ने का काफी शौक था। कोई कॉमिक या कोई स्टोरी बुक मिलते ही उसे एक दो दिन में खत्म कर लेती थी लेकिन अब एक किताब को पढ़कर खत्म करने में एक महीने से ज्यादा लग जाते हैं, क्योंकि अब स्मार्टफोन ने किताब की जगह ले ली है। स्मार्टफोन से ही लोग अपनी पसंद की किताब खोज के पढ़ लेते हैं। अब हमें किताबों से वो खुशबू नहीं मिलती जो अक्सर नई किताबों के पन्नों में मिलती थी।

दोस्तों का ग्रुप हो या कोई फैमिली पार्टी सभी लोग लोग अपने फोन में बिजी होते हैं। कोई व्हाट्सऐप देख रहा होता है तो कोई गेम खेल रहा होता है। लेकिन सालों बाद मिले लोगों से किसी को बात करने की फुर्सत नहीं। अब लोग किसी ओकेशन पर कॉल कर के बधाई नहीं देते बल्कि व्हाट्सऐप पर बस एक मैसेज कर देते हैं, रिश्तों को निभाए रखने के लिए। स्मार्टफोन ने आपसे और हमसे उन अहसासों को भी छीन लिया है जो छोटी-छोटी बातों में हमें मिलती थी।

हाल ही में व्हाट्सऐप पर एक वीडियो देखा जिसमें एक बच्चा खुद के स्मार्टफोन होने की इच्छा जाहिर करता है। उस बच्चे ने एक लेटर लिखा जिसमें उसने अपनी बातें लिखी। जिसे पढ़ने के बाद उसकी मां रोने लगती है। बच्चे ने लेटर में लिखा था कि उसके पापा ऑफिस से आने के बाद फोन में बिजी होते है। वो बच्चे के साथ खेलने के बजाय अपने स्मार्टफोन में गेम खेलते हैं। उसके पापा उसकी बातों का जवाब देने के बजाय फोन कॉल का रेस्पॉन्स ज्यादा देते हैं। उसकी मां ऑफिस से आने के बाद उसके साथ समय बिताने की जगह फोन के साथ समय बिताना ज्यादा पसंद करती हैं। इसलिए वो स्मार्टफोन होना चाहता है।

कुछ ऐसी ही कहानी हमारी भी हो सकती है। अगर हमने रिश्तों की जगह टेक्नोलॉजी को दे दी तो।

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