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अपने बचपन के खिलंदड़ेपन को बाहर लाने का दिन है होली

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 13, 2025 12:11 IST

जब लोगों को हमारे इस बचपन के दर्शन होंगे, तो निश्चय ही वे चकित हो जाएंगे. हतप्रभ होने की बारी उनकी होगी, क्योंकि जो कभी निर्ममता के आवरण से निकला ही नहीं, वह इतनी बचकानी हरकत कर सकता है?

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डॉ. महेश परिमल

होली को लेकर बहुत-से कसीदे गढ़े जाते हैं, यह दिन सौहार्द्र का होता है, इस दिन दुश्मनी को भूल जाना चाहिए. यह भाई-चारे का दिन है. इस दिन हमें हर तरह के रंग में रंग जाना चाहिए. इस दिन को यादगार बनाना चाहिए. ये सारी बातें अब कपोल-कल्पित लगती हैं. वास्तव में देखा जाए तो यही एक दिन ऐसा होता है, जिस दिन हम अपनों के बीच अपना बनकर रहें. अपने भीतर के अकुलाते बचपन को बाहर निकालें. सभी जानते हैं कि हम सबके भीतर बचपन दुबका हुआ होता है, जिसे कभी बाहर निकलने का अवसर नहीं मिलता.

वह बाहर आने के लिए अकुलाता रहता है. पर समाज की बेड़ियां इतनी सख्त होती हैं कि हमें अपने बचपन को मार डालना होता है. बचपन मरता तो नहीं, पर निष्क्रिय होकर शरीर में कहीं दबा-दबा-सा रहता है. उसे तो बस बाहर आने की प्रतीक्षा होती है, अवसर मिलने पर वह बाहर आ ही जाता है.

एक बहुत ही पुराना साक्षात्कार है, जिसमें जया बच्चन कह रही हैं कि मेरे तीन बच्चे हैं. तीसरे बच्चे का नाम अमिताभ बच्चन है. अब सोच लो, दो बच्चों के पिता होने के बाद भी अमिताभ जी में कितना बचपन भरा होगा, जो रह-रहकर बाहर आकर जयाजी को परेशान करता होगा.

वह भी उन परिस्थितियों में, जब एक ओर अमिताभ फिल्मों में व्यस्त रहते, अपने माता-पिता का ध्यान रखते और एक पिता की तरह बच्चों की परवरिश कर रहे होते हैं. ऐसे में जयाजी को यह कहना पड़े कि मैं सबसे ज्यादा तीसरे बड़े बच्चे से परेशान रहती हूं, यह कितनी बड़ी बात है. यह है बचपन जीने का एक अंदाज. जो हर किसी का अलग-अलग होता है. हर कोई अपने बचपन को अपनी तरह से जीने की कोशिश लगातार करता ही रहता है.  

इसलिए होली के इस पावन त्यौहार पर यह कहना है कि इस पर्व पर हम अपने बचपन को बाहर निकालकर उसके साथ हो लें, तो यही सच्ची होली होगी. यही दिन बचता है, जब हम पूरी शिद्दत के साथ अपनी युवावस्था, अपने बुढ़ापे के लबादे से निकलकर नन्हे कदमों से बाहर आएं. जब लोगों को हमारे इस बचपन के दर्शन होंगे, तो निश्चय ही वे चकित हो जाएंगे. हतप्रभ होने की बारी उनकी होगी, क्योंकि जो कभी निर्ममता के आवरण से निकला ही नहीं, वह इतनी बचकानी हरकत कर सकता है?

तो इस त्यौहार पर यह बता दिया जाए कि हमने भी बचपन को जिया है, हम भी कभी बच्चे थे, आज भले ही हमारे बालों पर सफेदी आ गई हो, पर भीतर के अकुलाते बचपन को हमने कभी मरने नहीं दिया. इसी बचपन ने हमें अभी तक जिंदा रखा है. यह नहीं होता तो हम बहुत पहले ही मर गए होते. सबका बचपन जीवित रहे, लोग बुढ़ापे में भी बचपन को याद करते हुए बचकानी हरकतें करते रहें, इसी कामना के साथ सभी को होली की शुभकामनाएं.

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