इसमें शक नहीं कि तालिबान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र पहले उन्हें मान्यता दे तो वे दुनिया की सलाह जरूर मानेंगे। संयुक्त राष्ट्र के सामने कानूनी दुविधा यह भी है कि वर्तमान तालिबान मंत्रिमंडल के 14 मंत्नी ऐसे है
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2014 के बाद दक्षेस का कोई शिखर सम्मेलन वास्तव में हुआ ही नहीं. 2016 में जो सम्मेलन इस्लामाबाद में होना था, उसका आठ में से छह देशों ने बहिष्कार कर दिया था.
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इन मौलिक अधिकारों का क्या होगा? क्या ये सिर्फ कागजों पर ही रह जाएंगे या कल्याणकारी नीतियां जारी रहेंगी? केंद्र सरकार के मोनेटाइजेशन (मौद्रीकरण) अभियान के मद्देनजर भारतीयों को परेशान करने वाले ये कुछ सवाल हैं
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अनुभवी लोग बताते हैं कि 1963 में जवाहर लाल नेहरू ने जो किया और नरेंद्र मोदी ने पहले जो 2014 और बाद में 2021 में किया, उसमें बहुत बड़ा अंतर है. पद्धति, प्रक्रिया और शैली के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
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भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि अभी पिछले हफ्ते ही अमेरिका ने एक नया संगठन खड़ा कर दिया है। उसका नाम है ऑकुस यानी ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और यूएस।
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सियासी अतीत को देखें तो ज्यादातर मामलों में चुनाव पूर्व नेता बदलने का कोई लाभ किसी पार्टी को नहीं मिला है. शरद पवार और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज भी चुनाव से पहले भेजे जाने पर पार्टी को जिता नहीं सके थे.
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1961 की जनगणना में कोई 30.4 फीसदी लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था. उर्दू और हिंदुस्तानी के आंकड़े भी जोड़ दिए जाएं तो यह प्रतिशत 35.7 तक पहुंच जाता है.
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यह शिकंजा क्या है? यह शिकंजा है- अंग्रेजी की गुलामी का! हमारे देश को आजाद हुए 74 साल हो गए लेकिन आज तक देश में एक भी कानून हिंदी या किसी भारतीय भाषा में नहीं बना।
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