मायावती द्वारा पिछले बीस साल में जिस शैली की राजनीति की गई, उसके संचित परिणाम के कारण आज उनके साथ न तो अति-पिछड़े हैं न ही मुसलमान। ये वोट उन्हें तब मिलते हैं जब वे इनमें से किसी को टिकट देती हैं।
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धार्मिक बहुलता हमारी ताकत है, सांस्कृतिक विविधता हमारा गौरव है. धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले इस ताकत और गौरव की अवहेलना ही नहीं कर रहे, उन्हें अपमानित भी कर रहे हैं.
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मराठवाड़ा में औरंगाबाद जैसे शिवसेना के गढ़ की महानगर पालिका में उसे बहुमत कभी नहीं मिला. विधानसभा चुनाव में भी शहर की तीनों सीटें जीतना उसके बस की बात नहीं थी.
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दूरगामी व्यापक लक्ष्यों के साथ अग्रसर कोई संगठन समूह इस तरह के अतिवादी विचार से स्वयं को कभी बांध नहीं सकता। विश्व इतिहास गवाह है कि प्रतिक्रियावादी विचारधारा वाले संगठन या समूहों की आयु बहुत लंबी नहीं होती।
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लोकतंत्र पर एक गंभीर संकट पार्टियों का ही खड़ा किया हुआ है. चुनाव के दरम्यान भले ही वे परिवारवाद का विरोध करें, मगर अपने भीतर परिवारवाद और सामंती सोच का विस्तार नहीं रोक पा रहे हैं.
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भारत दुनिया के उन देशों में से एक है जो उत्पादों और तकनीकी उपकरणों के पुर्जो की खरीद के लिए चीन का विकल्प तलाश रहे हैं। महामारी और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होने से विभिन्न वस्तुओं के अन्य देशों से आयात में मुश्किलें आई हैं। इस कारण भी भारत की चीन
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