Assembly elections 2022: पंजाब के लोगों को एक ईमानदार सरकार की पेशकश करते हुए दावा करते हैं कि वे सत्ता के भूखे नहीं हैं और उन्होंने राज्य में भ्रष्टाचार को खत्म करने की शपथ ली है.
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व्लादिमीर पुतिन के होश फाख्ता हो रहे होंगे कि नाटो की निष्क्रियता के बावजूद यूक्रेन अभी तक रूसी हमले का मुकाबला कैसे कर पा रहा है. अभी यूक्रेन में शांति होगी या नहीं, इस बारे में कुछ भी कहना संभव नहीं है.
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यूक्रेन संकट: सोवियत संघ के खंडहरों पर उगे स्वतंत्र देशों को जिस प्रकार से यूरोपीय संघ और नाटो का सदस्य बनाने की कोशिश की गई उसके विरुद्ध ऐसी ही प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी.
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देश की संसद के कानून अभी भी अंग्रेजी में ही बनते हैं. अदालतों की बहस और फैसले अंग्रेजी में ही होते हैं. जब सारे कार्य अंग्रेजी में ही चलते रहेंगे तो मातृभाषाओं को कौन पूछेगा?
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भारत के साथ अमेरिका का जो अतीत रहा है, वह इस बात की गारंटी नहीं देता कि दुनिया का यह स्वयंभू चौधरी घनघोर संकट के समय भी भारत के साथ खड़ा रहेगा. रूस हर मौके पर भारत का साथ निभाता आया है.
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अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन समय-समय पर घुसपैठ और बयानबाजी करता रहा है और अब वह इस इलाके में अस्थिरता के लिए छोटे आतंकी गुटों को शह दे रहा है। बीते कुछ सालों में अलगाववादी संगठनों पर बढ़े दबाव और उनके साथ हुए समझौतों ने माहौल को शांत बनाया है।
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रूस ने शीतयुद्ध-काल में भारत का लगभग हर मुद्दे पर समर्थन किया है. गोवा और सिक्किम के भारत में विलय का सवाल हो, कश्मीर या बांग्लादेश का मुद्दा हो, परमाणु बम का मामला हो- रूस ने हमेशा खुलकर भारत का समर्थन किया है.
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रूस-यूक्रेन जंग का असर व्यापार पर तो होगा ही. सबसे ज्यादा असर पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में भीषण उछाल के कारण पड़ेगा. भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी पेट्रोलियम पदार्थ आयात करता है.
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यदि नाटो राष्ट्र ईमानदार और दमदार होते तो वह तत्काल ही अपनी फौजें वहां भेजकर यूक्रे नी संप्रभुता की रक्षा करते लेकिन उनका बगलें झांकना सारी दुनिया को चकित कर गया।
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