भारत सरकार एक तरफ जहां इस विषम स्थिति में तटस्थता बरते जाने के आरोपों को लेकर सवालों के घेरे में है, वहीं दूसरी तरफ वह यूक्रेन में रह रहे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए समय रहते चेतावनी देने/ कार्रवाई नहीं करने के लिए भी कठघरे में है.
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क्या वास्तव में नाटो ने किसी लोकतंत्र की स्थापना के लिए लड़ाई लड़ी? नहीं, उसने तो लोकतंत्र और मानवता के लिए युद्ध नाम पर बड़े-बड़े अपराध किए हैं। ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जो अमेरिकी नेतृत्व में नाटो कार्रवाइयों का विकृत चित्र पेश करते हैं।
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यूक्रेन और रूस के बीच लड़े जा रहे युद्ध को लेकर उम्मीद करनी चाहिए कि ये फैलेगा नहीं, सिमट जाएगा. दूसरा विश्वयुद्ध हिरोशिमा और नागासाकी की विभीषिका के साथ समाप्त हुआ था. इस मुकाबले में स्थति आज और भयावह है.
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यहां आश्चर्य की बात यही है कि इस मतदान में चीन, भारत और पाकिस्तान तीनों ने अपना वोट नहीं दिया। तीनों ने परिवर्जन (एब्सटैन) किया। यानी तीनों राष्ट्र अपने-अपने राष्ट्रहित की सुरक्षा में लगे हुए हैं...
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सीटें कम होने के कारण स्नातकोत्तर स्तर पर तो हालात और अधिक चिंताजनक हैं। भारत में हर वर्ष औसतन 12 लाख विद्यार्थी नीट की परीक्षा देते हैं जबकि उपलब्ध सीटों की संख्या केवल 90 हजार है।
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भारत की तटस्थता उसे सर्वश्रेष्ठ मध्यस्थ बनने की योग्यता प्रदान करता है. वह रूस और अमेरिका, दोनों को अब भी समझा सकता है कि वे इस युद्ध को बंद करवाएं.
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ऐसी खबरें हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने हाल ही में अपनी उम्र को देखते हुए इस्तीफा देने की इच्छा व्यक्त की थी. डोभाल 77 साल के हैं.
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Russia Ukraine Crisis: 2009 में जॉर्जिया और यूक्रेन को भी नाटो सदस्यता की पेशकश की गई थी और रूस ने जॉर्जिया को नाटो का सदस्य बनने से रोकने के लिए सैन्य हस्तक्षेप किया था.
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