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ब्लॉग: हिंदी का विश्व और विश्व की हिंदी

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: January 10, 2022 11:10 IST

शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी की स्वीकृति और उपयोग न होने से हिंदी की सामग्री की गुणवत्ता भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रही है पर उससे भी अधिक चिंता की बात यह है हिंदी की पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र-छात्राओं की प्रतिभा का विकास बाधित हो रहा है.

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ठळक मुद्देबीसवीं सदी के आरंभ में शुरू हुई हिंदी की पत्रकारिता भी कुछ कम तेजस्वी न थी. विदेशों के कई विश्वविद्यालय हिंदी के अध्यापन और अनुसंधान में लगे हुए हैं.अब तक 11 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं जिनमें से अधिकांश भारत से बाहर विदेशों में हुए हैं.

हिंदी कई सदियों से कोटि-कोटि भारतवासियों की अभिव्यक्ति, संचार और सृजन के लिए एक प्रमुख और सशक्त माध्यम का कार्य करती आ रही है. वह वृहत्तर समाज के जीवन में उसके दु:ख-सुख, हर्ष-विषाद और राग-विराग की विभिन्न छटाओं के साथ जुड़ी रही. संवाद को संभव बनाते हुए हिंदी ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में जान भरने का काम भी किया था और हर कदम पर आगे बढ़कर सबको जोड़ती रही. 

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यही पता चलता है कि हिंदी में रचे गए साहित्य का समाज के साथ समकालिक रिश्ता बना रहा और वह समाज को प्रेरित-अनुप्राणित करता रहा. 

यदि भक्त कवियों की वाणी ने कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, जायसी, रैदास आदि द्वारा मुखरित होकर कठिन क्षणों में आत्मिक और नैतिक बल देकर समाज को शक्ति दी थी तो बीसवीं सदी के आरंभ में शुरू हुई हिंदी की पत्रकारिता भी कुछ कम तेजस्वी न थी. 

वह ‘स्वाधीन भारत’ का उद्घोष करते हुए अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ जन-जागरण का कार्य करती रही और समाज के मानस का निर्माण करती रही. 

इस तरह देश भक्ति, स्वराज्य और स्वतंत्र भारत की संकल्पना को गढ़ने और आमजन तक पहुंचाने में हिंदी की विशेष भूमिका थी जिसे देश के अधिकांश नायकों ने अनुभव किया था.

आज सृजनात्मक साहित्य की दृष्टि से हिंदी समृद्ध दिखती है. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिंदी की उल्लेखनीय उपस्थिति है जो संभवत: पाठकों और दर्शकों की बड़ी संख्या के कारण है. शास्त्रीय (अकादमिक) साहित्य की दृष्टि से जरूर हिंदी की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती क्योंकि अकादमिक दुनिया के मन में हिंदी को लेकर संशय की एक गांठ बनी हुई है और अंग्रेजी का ही प्राबल्य बना हुआ है. 

शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी की स्वीकृति और उपयोग न होने से हिंदी की सामग्री की गुणवत्ता भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रही है पर उससे भी अधिक चिंता की बात यह है हिंदी की पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र-छात्राओं की प्रतिभा का विकास बाधित हो रहा है. 

दस-बारह प्रतिशत लोगों द्वारा बोली समझी जाने वाली अंग्रेजी की बलि वेदी पर ज्ञान, प्रतिभा और योग्यता आदि की लगातार अनदेखी करते रहना किसी भी तरह से क्षम्य नहीं है. 

स्मृति और भाषा के बीच जैसे बड़ा गहरा रिश्ता है, उसी तरह स्मृति हमारी अपनी पहचान से भी जुड़ी हुई है. विश्व के अनेक देशों में फैले भारतीय मूल के लोगों का हिंदी से लगाव और भारतीय संस्कृति के संरक्षण में रुचि इसकी पुष्टि करती है. 

विदेशों के कई विश्वविद्यालय हिंदी के अध्यापन और अनुसंधान में लगे हुए हैं. नागपुर में 10 से 12 जनवरी को आयोजित पहले विश्व हिंदी सम्मेलन से हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप पर चर्चा और हिंदी के संवर्धन के लिए उपाय करने की कोशिश शुरू हुई. 

अब तक 11 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं जिनमें से अधिकांश भारत से बाहर विदेशों में हुए हैं. हिंदी के प्रति रुचि बढ़ाने में इस उपक्रम ने बड़ी भूमिका अदा की है. 

हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की मान्य विश्व भाषा के रूप में मान्यता दिलाना एक प्रमुख उद्देश्य रहा है पर अनेक कारणों से यह प्राप्त नहीं हो सका है. यह प्रगति जरूर हुई है कि संयुक्त राष्ट्र के ट्विटर हैंडिल पर हिंदी में समाचार शुरू हो चुके हैं. 

संयुक्त राष्ट्र में अटल बिहारी वाजपेयी तथा सुषमा स्वराज ने अपने वक्तव्य हिंदी में दिए. प्रधानमंत्री मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्राय: हिंदी का ही प्रयोग करते हैं, यह देख भारतीयों को अच्छा लगता है पर इन सबका सीमित परिणाम ही होता है.

आज यूरो-अमेरिकी विचार और सिद्धांत अंतिम सत्य माने जाते हैं और उनसे पुष्टि होने की प्रबल आकांक्षा सबके मन में रहती है. उनके ज्ञान को सार्वभौमिक ही नहीं सार्वकालिक मानकर समस्त पश्चिमी अकादमिक कार्रवाई के पीछे-पीछे चलने की आदत हो चुकी है. 

चूंकि आत्मनिर्भर होने की राह भाषा से ही गुजरती है और हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं औपनिवेशिक मानसिकता से उबारने और स्वायत्त होने की संभावना बढ़ाती हैं, इसलिए अपनी भाषाओं की उपेक्षा देश के हित में नहीं है.

टॅग्स :हिन्दी दिवसभारतनागपुरएजुकेशन
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