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विजय दर्डा का ब्लॉग: यदि कभी गंगा की मौत हो गई तो क्या होगा?

By लोकमत न्यूज़ ब्यूरो | Updated: October 15, 2018 05:03 IST

एक नदी थी सरस्वती, कोई चार हजार साल पहले उसकी मौत हो गई। आज के हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के इलाके में बहती थी।

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एक नदी थी सरस्वती। कोई चार हजार साल पहले उसकी मौत हो गई। आज के हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के इलाके में बहती थी। उसकी मौत कैसे हुई, कुछ पता नहीं लेकिन नदी के प्रति हमारी आस्था इतनी मजबूत है कि आज भी लोग यह मानते हैं कि सरस्वती नदी जमीन के भीतर बहती है और इलाहाबाद में जाकर गंगा और यमुना से मिलती है। इसीलिए उस स्थान को संगम भी कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने सरस्वती के रास्ते को तलाशने की कोशिश की है और कुछ साल पहले बड़ा हो-हल्ला मचा था कि उसे पुनर्जीवित किया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ खास हुआ नहीं! 

यह तो हुई बात उस नदी की जिसका कोई वजूद नजर नहीं आता।  बड़ा सवाल यह है कि जिस नदी का पूरा वजूद हमारे सामने है, जो धीरे-धीरे मरने की कगार पर पहुंच रही है, उसे बचाने के लिए हम क्या कर रहे हैं? देश की बहुत सी नदियां मरने की कगार पर हैं या पूरी तरह दम तोड़ चुकी हैं। स्थानीय स्तर की नदियां तो  केवल बरसाती बहाव के रूप में तब्दील हो गई हैं। कहने को तो बड़ी-बड़ी योजनाएं हैं, पैसा भी खर्च हो रहा है, कागजों पर काम भी हो रहा है लेकिन नदियों की हालत सुधरती नहीं दिख रही है। 

इस वक्त जो सबसे बड़ी चिंता है, वह गंगा नदी को लेकर है। ढाई हजार किलोमीटर से अधिक का फासला तय करने वाली गंगा भारत में करीब 2071 किलोमीटर और शेष रास्ता बांग्लादेश में तय करती है। भारत का करीब 10 लाख वर्ग किमी का भूभाग गंगा का इलाका कहलाता है। गंगा इस भूभाग को सींचती है और इसे फसलों के लिए अनुकूल बनाती है। अपने किनारे बसे करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती रही है गंगा। इस नदी को पूरी दुनिया की नदियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता रहा है क्योंकि प्राकृतिक रूप से इसके जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों को खत्म करने की क्षमता रखते हैं। इसी कारण यह नदी जीवनदायिनी कहलाती रही है लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि यही गंगा हरिद्वार के बाद इतनी गंदी होती चली गई है कि इसका पानी न पीने योग्य रह गया है और न नहाने योग्य।

इसी साल जुलाई में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जांच-पड़ताल के बाद यह कहा कि हरिद्वार से उन्नाव के बीच गंगा का पानी पीने और नहाने योग्य नहीं है। जरा सोचिए कि उन्नाव के आगे तो गंगा और भी प्रदूषित है तो वहां क्या हाल होगा! एनजीटी ने स्पष्ट रूप से कहा कि मासूम लोग श्रद्धापूर्वक नदी का जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है। अगर सिगरेट के पैकेटों पर वैधानिक चेतावनी लिखी हो सकती है तो आम आदमी को नदी का पानी घातक होने की जानकारी क्यों न दी जाए? एनजीटी ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को निर्देश दिया कि हर सौ किलोमीटर पर बोर्ड लगाया जाए जिसमें यह लिखा हो कि पानी पीने और नहाने योग्य है या नहीं!

हमने अपने बचपन में गंगा को स्वच्छ और निर्मल देखा है। हमने इलाहाबाद का संगम देखा है, बनारस के घाट देखे हैं। अब जब इस नदी को देखता हूं तो चिंता में डूब जाता हूं। जिस मानव को गंगा ने अपने किनारे जिंदगी को विकसित करने का अवसर प्रदान किया, उसी मानव ने गंगा को खत्म करने की कगार पर ला खड़ा किया। इसके किनारे बसी आबादी ने न केवल कूड़ा-कचरा डाला बल्कि नालों का रुख नदी की ओर मोड़ दिया। फैक्ट्रियों ने गंदा पानी और हानिकारक मटेरियल को बहाना शुरू किया। जब बहुत हल्ला मचा तो कुछ फैक्ट्रियों को बंद जरूर किया गया लेकिन अनुमान है कि अब भी गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि गंगा बीमार है। बायोलॉजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री होना चाहिए जो बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। दूसरी तरफ गर्म होते वातावरण ने भी गंगा को प्रभावित किया है। 2007 में  संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि गंगा को जलापूर्ति करने वाले ग्लेशियर 2030  तक समाप्त हो सकते हैं। यानी स्थिति वाकई गंभीर है। अब सवाल पैदा होता है कि क्या हमारी व्यवस्था इस बड़ी नदी को लेकर चिंतित है? मुङो तो इसमें कमी दिखाई देती है। जो लोग गंगा के लिए संघर्षरत हैं उनकी सुनवाई ही नहीं हो रही है। उपेक्षा का भाव साफ-साफ दिख रहा है। गंगापुत्र के नाम से पहचाने जाने वाले प्रो। जी।डी। अग्रवाल 111 दिनों तक अनशन करते रहे लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली। गंगा के लिए उन्होंने अपना बलिदान कर दिया। आश्चर्यजनक यह है कि इस पर कोई हो-हल्ला भी नहीं मचा। मुङो लगता है कि नदियां हमारी प्राथमिकता में हैं ही नहीं। सबको यह समझ लेना चाहिए कि यदि गंगा की मौत हुई तो यह पूरे देश के लिए खतरनाक होगा क्योंकि गंगा बहुत सी क्षेत्रीय नदियों को भी आधार देती है। यमुना तो करीब-करीब मर ही चुकी है। गंगा को तो बचा लीजिए!

एक बात और कहना चाहूंगा कि नदियां किसी भी देश के जीवन का आधार होती हैं। मैं दुनिया के बहुत सारे देशों में घूमता रहा हूं और मैंने देखा है कि शहरों के बीच बहने वाली नदियां भी इतनी साफ होती हैं कि उनका तल दिखाई देता है। अमेरिका, इंग्लैंड, रूस या अन्य किसी भी देश में नदियों के संरक्षण के प्रति पूरा देश समर्पित नजर आता है। मेरे मन में सवाल  पैदा होता है कि हम क्यों चूक रहे हैं। नदियां ट्रांसपोर्टेशन का भी बड़ा माध्यम होती हैं। दुनिया में करीब 35 प्रतिशत ट्रांसपोर्टेशन पानी के माध्यम से होता है। हमारे देश में गंगा में पहले काफी परिवहन होता था, लेकिन वह करीब-करीब समाप्त हो गया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, जहाजरानी और जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्नी नितिन गडकरी ने काफी कोशिश की है लेकिन उनके पास वक्त कम है। हम उम्मीद करें कि नितिन गडकरी ने जो सपना देखा है वह पूरा हो।

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