अभिलाष खांडेकर
मुझे नहीं पता कि चुनावी शब्दावली में ‘सत्ता-विरोधी लहर’ जैसे जटिल राजनीतिक शब्दों का प्रयोग किसने और कब किया. तर्कसंगत रूप से, मुझे आश्चर्य होता है कि यह अदृश्य कारक कैसे एक राज्य में काम करता है, जबकि दूसरे में उसी समय विफल हो जाता है! पांच राज्यों में हुए हालिया चुनाव भी अपवाद नहीं थे; उन्होंने किसी न किसी तरह से चौंकाने वाले परिणाम दिए. ‘सत्ता-विरोधी लहर’ ने ममता बनर्जी को खासा नुकसान पहुंचाया; इसने दक्षिण में एमके स्टालिन और अस्सी वर्षीय पिनाराई विजयन को भी सत्ता से बेदखल कर दिया, लेकिन उत्तर-पूर्व में इसने एक मुख्यमंत्री को बचा लिया!
क्या लंबे समय से चले आ रहे इस राजनीतिक अनुभव में कुछ बदलाव आ रहा है? या फिर भाजपा ने इसका दोनों तरह से इस्तेमाल करने की कला में महारत हासिल कर ली है? उदाहरण के लिए, सत्ता-विरोधी भावनाएं, अगर थीं भी, तो बंगाल में पूरी तरह से घिरी हुई 71 वर्षीय ममता के खिलाफ बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया गया, लेकिन कांग्रेस से पाला बदलकर आए हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ कुछ भी काम नहीं आया! ऐसा क्यों हुआ? भाजपा ने तो असम में लगातार तीसरी बार जीत हासिल की. ममता और उनकी क्षेत्रीय पार्टी की तमाम मुश्किलों के बावजूद मतों के चार प्रतिशत से भी कम के अंतर से पराजय का श्रेय ‘सुनियोजित’ या ‘क्यूरेटेड’ चुनावों को दिया जा रहा है. यह चुनावी शब्दावली में एक नया मुहावरा है.
लेकिन मुझे एक और कारण से दु:ख होता है. द्रमुक और तृणमूल जैसी क्षेत्रीय पार्टियां - जो लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है - के पतन के साथ नई भाजपा के नेतृत्व वाले ‘पूंजीवादी भारत’ में एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में साम्यवाद भी मरता दिख रहा है. केरल में सत्ता विरोधी लहर के कारण सीपीआई के नेतृत्व वाले गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा और प. बंगाल में, जहां दशकों तक वामपंथियों का वर्चस्व रहा, भगवा लहर में केवल एक विधायक ही बच पाया.
अब जबकि भाजपा ने अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने का सपना सच कर दिखाया है, उस पर यह साबित करने का दबाव है कि वह पश्चिम बंगाल में सुशासन लौटाए, जहां लाखों ‘घुसपैठिए’ सीमा पार से घुस आए हैं और अवैध रूप से रह रहे हैं. उन्हें बाहर करना होगा. उद्योगों को भी बड़े पैमाने पर स्थापित करना होगा और बेहतर कानून व्यवस्था बहाल करनी होगी.
इन चुनावों में हारने वालों के लिए कोई सबक? हां, उन्हें अपना जमीनी आधार मजबूत करना होगा; बेहतर रणनीतियों के साथ चुनाव लड़ना होगा; अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन करना होगा.