Operation Sindoor's first anniversary: पिछले कुछ महीनों से एलओसी पर काफी हद तक शांति बनी हुई है, लेकिन पीड़ितों के परिवारों का कहना है कि जब तक उन्हें पूरी तरह से सुरक्षा और न्याय का एहसास नहीं हो जाता, तब तक यह शांति अधूरी ही मानी जाएगी। एलओसी से सटे बोनियार के निवासी कहते थे कि हम नहीं चाहते कि किसी और को भी इस दौर से गुजरना पड़े। शांति बनी रहनी चाहिए, वह फिर से भंग नहीं होनी चाहिए।
जैसे-जैसे सीमावर्ती गांव धीरे-धीरे फिर से बस रहे हैं, उन लोगों के नाम जो इस संघर्ष में खो गए, आज भी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बने हुए हैं—ये एलओसी के किनारे रहने वाले आम नागरिकों द्वारा चुकाई गई संघर्ष की भारी कीमत की एक खामोश याद दिलाते हैं।
लाइन आफ कंट्रोल (एलओसी) पर पाकिस्तान की जोरदार गोलाबारी में करीब 16 आम नागरिकों की जान जाने के लगभग एक साल बाद भी, पुंछ, राजौरी और उत्तरी कश्मीर के परिवार उस नुकसान के साथ जी रहे हैं, जो समय के साथ कम नहीं हुआ है।
पिछले साल मई में 'आपरेशन सिंदूर' के बाद हुई सैन्य झड़प के बाद तनाव बढ़ गया था। इसके चलते पाकिस्तान ने भारी तोपखाने और मोर्टार से गोलाबारी शुरू कर दी, जिससे उड़ी, करनाह और सीमा से सटे अन्य गांवों में आम लोगों के इलाके प्रभावित हुए। लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा, जिससे मौत और तबाही का मंजर पीछे छूट गया।करनाह की एक महिला, जिसने इस घटना में अपने पति को खो दिया था, कहती थीं कि वह हमारे परिवार में कमाने वाला अकेला सदस्य था।
अब तो हमारे लिए अपनी रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है। वे कहती थीं कि हमें मुआवजा तो मिल गया, लेकिन वह किसी की जान की भरपाई नहीं कर सकता।
मारे गए लोगों में उड़ी का एक दिहाड़ी मजदूर भी शामिल था। उसके परिवार का कहना है कि उस रात के बाद से उनकी जिंदगी पहले जैसी नहीं रही।
परिवार की एक सदस्य रुबीना कहती थीं कि वह अभी-अभी घर लौटा ही था कि गोलाबारी शुरू हो गई। हमें लगा कि यह जल्द ही रुक जाएगी, लेकिन एक गोला हमारे घर के पास आकर गिरा। वे बोली कि हमने उसे कुछ ही पलों में खो दिया। उस रात सब कुछ खत्म हो गया।पुंछ और राजौरी में, जहां सबसे अधिक गोलाबारी होने की खबरें थीं, परिवारों ने बताया कि कैसे शाम का एक आम सा माहौल अचानक दहशत के मंजर में बदल गया।
पुंछ के रहने वाले मुजफ़्फर हुसैन, जिन्होंने इस घटना में अपने एक रिश्तेदार को खो दिया था, कहते थे कि हम रात का खाना खा रहे थे, तभी धमाकों की आवाजें आने लगीं। बच्चे रो रहे थे और लोग इधर-उधर भाग रहे थे। उन्होंने बताया कि सुबह होते-होते हमने उसे खो दिया। अब कहने के लिए कुछ भी बाकी नहीं बचा था।अधिकारियों के मुताबिक, इस गोलाबारी में कम से कम 13 से 16 आम नागरिकों की जान गई थी। दर्जनों लोग घायल हुए थे, और कई घरों को नुकसान पहुंचा था या वे पूरी तरह तबाह हो गए थे। कई परिवारों के लिए यह नुकसान सिर्फ भावनात्मक ही नहीं, बल्कि आर्थिक भी था।
राजौरी के एक और परिवार ने बताया कि जब भी सीमा पर तनाव बढ़ता है, तो उन्हें वे पुरानी यादें फिर से सताने लगती हैं। परिवार के एक रिश्तेदार ने बताया कि जब भी हमें कहीं भी गोलीबारी होने की खबर मिलती है, तो हम डर जाते हैं। ऐसा लगता है, जैसे वह भयानक रात फिर से लौट आई हो।
उड़ी, करनाह और टंगधार के निवासियों का कहना है कि इस गोलाबारी ने उनके मन पर गहरे मनोवैज्ञानिक घाव छोड़ दिए हैं, खासकर उन बच्चों के मन पर, जिन्होंने अपनी आंखों से इस हिंसा को होते देखा था।
एक स्थानीय निवासी कहते थे कि जोरदार आवाजें सुनकर बच्चे आज भी डर जाते हैं। उन्हें उस रात की हर बात अच्छी तरह याद है।