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राजेश बादल का ब्लॉग: दल-बदल के दलदल में फंसे सियासी दल

By राजेश बादल | Updated: January 19, 2022 11:18 IST

पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज है. कई नेता अपना पाला बदल रहे हैं. ऐसा नजारा करीब-करीब हर चुनाव में नजर आता है. मगर यह भारतीय लोकतंत्र की दीवारों में दरारें डाल रहा है.

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पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं. इस कारण दल-बदल का धंधा गरम है. प्रत्येक पार्टी अपने घर से बाहर निकलते हुए सदस्यों को देख रही है और उनके स्थान पर प्रतिद्वंद्वियों से घर भर रही है. पार्टी छोड़ने वालों के लिए यह जोखिम भरा जुआ है. एक ही दल जीतेगा. उसके पाले में आए नेता पांच साल तक सत्ता का सुख भोगेंगे और अगला चुनाव आते-आते नए बसेरे के लिए उड़ जाएंगे. पराजित पार्टी में गए लीडर हाथ मलते रह जाएंगे.

चुनावी मौसम इन प्रवासी पक्षियों को भले ही रास आता हो, मगर यह भारतीय लोकतंत्र की दीवारों में दरारें डाल रहा है. चुनाव-दर-चुनाव दरारें और चौड़ी होती जा रही हैं. खेदजनक है कि पहले यह बीमारी उत्तरप्रदेश, बिहार और हरियाणा जैसे राज्यों में अधिक थी, लेकिन अब तो अपेक्षाकृत ज्यादा साक्षर और छोटे प्रदेशों में भी फैलती जा रही है.

गोवा के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है. बीते पांच साल में साठ सदस्यों वाली विधानसभा में चौबीस विधायकों ने दल बदला. यह चौंकाने वाला आंकड़ा है. इनमें वे भी शामिल हैं, जो अपनी पार्टी छोड़कर आने के बदले मंत्री पद को सुशोभित कर रहे थे. ऐसा ही कुछ उत्तराखंड में हुआ. वहां कांग्रेस से भाजपा में आए एक वरिष्ठ मंत्री को बर्खास्त कर दिया गया. अब वे समर्थकों के साथ घर वापसी कर रहे हैं. अन्य छोटे प्रदेशों में तो एक-दूसरे के सहयोगी दलों को ही तोड़ने का सिलसिला बढ़ गया है. मणिपुर इसका नमूना है. वहां कांग्रेस ने भाजपा की सहयोगी पार्टी को ही अपने साथ ले लिया.

उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी यह बीमारी बेशर्म रूप में उपस्थित है. दल-बदल का अपराध शौर्य की तरह महिमामंडित किया जा रहा है. सत्तारूढ़ भाजपा के तीन मंत्री और करीब एक दर्जन विधायक पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम चुके हैं. विडंबना ही है कि दूसरी पार्टी से आने वाले नेताओं को शामिल करने के लिए लखनऊ में बाकायदा समारोह आयोजित किया गया और उसके लिए चुनाव आयोग के निर्देशों की धज्जियां उड़ा दी गईं.

आयोग ने कोरोना की तीसरी लहर से बचाव और तेजी से फैल रहे संक्र मण के मद्देनजर रैलियों, सभाओं, रोड शो तथा भीड़ भरे कार्यक्रमों वाले प्रचार अभियान पर रोक लगाई थी. लेकिन समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने हजारों मतदाताओं को कार्यालय में एकत्रित किया. एक तरह से एक लोकतांत्रिक जुर्म को महिमामंडित किया गया.

वास्तव में ऐसे दल-बदल मतदाताओं के साथ भी धोखा हैं. वोटर सिर्फ चेहरे को देखकर ही अपना वोट नहीं देता. वह प्रत्याशी की पार्टी, उसका वैचारिक आधार तथा देश और समाज के लिए किए गए काम को भी परखता है. उसके बाद ही वह अपने मत का निर्णय करता है. जीतने के बाद कोई विधायक या सांसद पाला बदल कर दूसरी पार्टी में प्रवेश करता है तो उसे कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता. दल-बदल करने वाले नेता की सीट पर पार्टी बदलते ही नया चुनाव कराना, इस समस्या को नियंत्रित करने की दिशा में एक कदम हो सकता है.

जम्हूरियत की इस बीमारी को रोकने के लिए करीब चार दशकों से गंभीर बहस चल रही है. किसी सरकार को दल-बदल से खतरा हो और वह कदम उठाए तो उसका राजनीतिक स्वार्थ समझ में आता है. लेकिन यदि सरकार के गिरने की आशंका नहीं हो और वह इसके खिलाफ कानून बनाए तो यह उसकी नेकनीयती ही मानी जाएगी.

प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने 1985 में दल-बदल कानून बनाया तो उनकी हुकूमत के लिए कोई चेतावनी नहीं थी. उनकी सरकार प्रचंड बहुमत से आई थी और वास्तव में चुनाव सुधार करना चाहती थी. इस काम में उसे विपक्ष का भी भरपूर सहयोग मिला था. उन दिनों प्रतिपक्ष में अटलबिहारी वाजपेयी, मधु दंडवते, इंद्रजीत गुप्त और सोमनाथ चटर्जी जैसे बड़े हस्ताक्षर सदन में होते थे, जिन्होंने सरकार को इस बीमारी पर रोकथाम के लिए भरपूर सहयोग दिया था.

अफसोस, बाद की सरकारों और चुनाव आयोग ने इस कानून की मंशा पूरी नहीं होने दी. दल-बदलुओं ने धीरे-धीरे समूची सियासत का तालाब गंदा कर दिया. इस सियासी सौदेबाजी को क्षेत्रीय दलों ने बढ़ावा दिया. इन दलों ने उग्र महत्वाकांक्षा और जल्द कामयाबी पाने के लिए दल-बदल कानून के चोर दरवाजे खोज लिए. इस तरह राजीव गांधी के प्रयास बेकार चले गए.

आज नौबत यहां तक आ पहुंची है कि निर्वाचित हुकूमतें ही सरकार बनाने, बचाने और गिराने के लिए इस दुष्कृत्य को बढ़ावा दे रही हैं. जिस नेता के चेहरे पर नैतिक उजास नहीं हो और दलबदल की कालिख पुती हो, वह किस आधार पर मतदाता के दरबार में  वोट मांगने जाएगा?

समग्र समाधान की बात करें तो दल-बदल कानून में सख्त संशोधन होना चाहिए. दल बदलने वाले को कारावास होना चाहिए और जो जेल की हवा खा ले, उसे जीवन भर चुनाव लड़ने से वंचित कर देना चाहिए. लेकिन, इसके लिए सारी पार्टियों को एक मंच पर आना होगा. यही सबसे कठिन है.

एक जमाने में इस पर भी देश में बहस चली थी कि जो नेता ग्रेजुएट नहीं हो, उसे चुनाव लड़ने की पात्रता नहीं होनी चाहिए. इसका कोई विकल्प हो सकता है तो यह कि जो भी नामांकन दाखिल करे, उसे शपथपत्र देना जरूरी हो. इसमें लिखा हो कि अगर उसने जीतने के बाद दल बदला तो उसके विरुद्ध धोखाधड़ी और वादाखिलाफी का आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा. यह मामला सरकार की ओर से पंजीबद्ध कराया जाए. तय है कि इस मामले में सजा मिल जाने के बाद वह जिंदगी भर चुनाव नहीं लड़ पाएगा.

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