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राजेश बादल का ब्लॉग- लोकतंत्र: ये कहानी है दिये की और तूफान की

By राजेश बादल | Updated: February 15, 2022 10:09 IST

लोकतंत्र पर एक गंभीर संकट पार्टियों का ही खड़ा किया हुआ है. चुनाव के दरम्यान भले ही वे परिवारवाद का विरोध करें, मगर अपने भीतर परिवारवाद और सामंती सोच का विस्तार नहीं रोक पा रहे हैं.

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लोकतंत्र की लड़ाई अब देश का आम इंसान लड़ रहा है. पचहत्तर साल की जम्हूरियत का नतीजा है कि सियासी पार्टियां धीरे-धीरे तंत्र से किनारा करती जा रही हैं. उनके भीतर अधिनायकवादी सोच विकराल आकार ले रही है और लोकतंत्र का टिमटिमाता दिया लेकर जनता मुकाबले में उतर आई है. दिलचस्प है कि अवाम को नहीं पता कि वह किसी ऐसे मोर्चे पर डटी हुई है. 

वह बस इतना कर रही है कि जो लीडर उसे पसंद नहीं, उसे खारिज कर देती है. यही लोकतंत्री को बनाए और बचाए रखने की बुनियादी शर्त है.

किसी भी जिंदा जम्हूरियत की खास बात क्या है? लोगों के लिए, लोगों के द्वारा, लोगों का बनाया सामूहिक शासन तंत्र. इस प्रणाली में विचार प्रधान है. यह किसी एक को नहीं, बल्कि प्रत्येक इंसान को समाज संचालन में सहभागिता का अवसर देता है. इस संचालन का रीढ़-भाव सामूहिक भागीदारी है. वह किसी एक व्यक्ति को शासन का हक नहीं देता. 

मुख्य बात यह है कि लोग ही समाज और देश के लिए नियामक सिद्धांत बनाएं. तानाशाही छोड़कर चाहे वह कोई भी व्यवस्था क्यों न हो. भारतीय संविधान में इसीलिए बहुदलीय ढांचे को स्थान दिया गया है ताकि लोग अपने-अपने विचार के आधार पर जनादेश प्राप्त कर सकें. दु:ख है कि मौजूदा लोकतंत्र में अब केवल ढांचा शेष है. आत्मा यानी विचार कहीं विलुप्त हो गए हैं. पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनाव यही तस्वीर पेश करते हैं.

हमने देखा है कि पार्टियों के गठबंधन का आधार वैचारिक नहीं होता. बड़ी पार्टी छोटे दलों को लुभाती है. बात बन गई तो ठीक वर्ना छोटी पार्टी दूसरे गठबंधन की ओर ताकने लगती है. यानी अनेक दल ऐसे हैं, जिन्हें किसी भी विचार वाली पार्टी से रिश्ता जोड़ने में ङिाझक नहीं होती. बेशर्मी की हद तो यह है कि एक दल का नेता दूसरे दल के प्रतीक चिह्न् पर चुनाव लड़ने से संकोच नहीं करता. 

हरियाणा के पिछले चुनाव में मतदाता देख चुके हैं कि पूरे चुनाव के दौरान पक्ष और विपक्ष में लड़ रही पार्टियां परिणाम आने के बाद गठजोड़ कर बैठीं और अब मिलकर सत्ता की मलाई खा रही हैं. जनता अपने को ठगा महसूस कर रही है. उत्तर प्रदेश का वोटर जानता है कि यदि चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला तो आपस में धुर विरोधी नजर आ रहे दल बोली लगाएंगे और समर्थन देने को उतावले रहेंगे. 

मान लीजिए, ऐसा नहीं हो तो बड़ा दल सामने वाली पार्टी के सदस्यों को लालच देकर तोड़ देगा. अर्थात् मतदाता एक बार फिर धोखा खाने को तैयार रहें.

लीडरों की भाषा भी मतदाता को निराश करती है. वे भूल गए हैं कि देश के संविधान ने प्रत्येक निवासी को अपनाया है, उसे वोटर कार्ड दिया है और देश में हासिल सारे हक दिए हैं. इसके बावजूद शिखर नेता प्रचार में अलग-अलग समुदायों से अलग-अलग बर्ताव करते हैं. वे बोलते हैं कि अमुक पार्टी ने इस इलाके को इस्लामाबाद (पाकिस्तान) बना दिया है. यह घटिया और शर्मनाक है. 

किसी वर्ग को आप नापसंद करते हैं तो करिए, पर आपकी मूर्खता उन भारतीयों को अपमानित करने का अधिकार नहीं देती. इसी तरह निजी हमलों की तो जैसे बाढ़ आ गई है. अश्लील टिप्पणियां, गालीगलौज, असंसदीय शब्दावली बिना संकोच बोली जा रही है. महिलाओं के सम्मान का दिखावा करने वाले लोग उनके चरित्र पर कीचड़ उछाल रहे हैं. वे भूल रहे हैं कि भारत में जब भी चुनाव में महिलाओं के खिलाफ अश्लील टिप्पणियां हुईं, वह पार्टी सत्ता से बाहर हो गई. नेताओं की भाषा उनके मानसिक स्तर का भी सबूत है. यह बताती है कि खुद को अभिव्यक्त करने के लिए नेताओं के पास साफ-सुथरे शब्दों का अकाल है.

लोकतंत्र पर एक गंभीर संकट इन पार्टियों का ही खड़ा किया हुआ है. चुनाव के दरम्यान भले ही वे परिवारवाद का विरोध करें, मगर अपने भीतर परिवारवाद और सामंती सोच का विस्तार नहीं रोक पा रहे हैं. इन पार्टियों के शिखर पुरुषों को परिवार से बाहर किसी राजनेता का भरोसा नहीं होता. यह अलग बात है कि परिवार के लोग सत्ता का स्वाद चखते ही कई बार बगावत पर उतर आते हैं. 

ताजा खबरें बंगाल से तृणमूल कांग्रेस से आई हैं. सुप्रीमो ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी उनके भतीजे ही रूठ गए. बिना पार्टी संविधान में बदलाव किए ममता ने सारे पद भंग कर दिए. पूर्व में लोक जनशक्ति पार्टी में सुप्रीमो चिराग पासवान से चाचा रूठ गए थे और अलग झंडा उठा लिया था. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी मुखिया शरद पवार के विरोध में भतीजे का विद्रोह देख चुकी है. शिवसेना चचेरे भाइयों में कलह से उबरी है. 

समाजवादी पार्टी में अध्यक्ष अखिलेश यादव का चाचा शिवपाल से विवाद जगजाहिर है. डीएमके पारिवारिक उत्तराधिकार के विवाद से अछूती नहीं रही. कांग्रेस में मेनका गांधी का उनकी सास इंदिरा गांधी से झगड़ा सबको पता है. भाजपा में भी कई नेताओं के पारिवारिक विवादों ने उन्हें आमने-सामने कर दिया है. विजयाराजे सिंधिया की पुत्र माधवराव से अनबन और यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा के अलग-अलग ध्रुव उजागर हैं. अपना दल में मां-बेटी की कलह सामने है. 

इन उदाहरणों से क्या नहीं लगता कि हम मध्ययुगीन सामंती दौर में हैं, जब सिंहासन के लिए परिवार में संघर्ष होता था. घर के भीतर से परिवार के किसी सदस्य को गद्दी पर बैठाने की चाहत आम आदमी के बीच से वर्षो तक संघर्ष  करके बढ़े जनाधार वाले नेता को उभरने का अवसर नहीं देती. ऐसे में लोकतंत्र की चिंता कौन करे? देखना है अवाम के हाथ में लोकतंत्र का दिया जलता रहता है और तूफानी तानाशाही का मुकाबला कर पाता है या नहीं.

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