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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: आप स्वयं तय कीजिए बहुमत की सरकार चाहिए या गठजोड़ की?

By अभय कुमार दुबे | Updated: November 1, 2018 12:53 IST

भारतीय लोकतंत्र में यह प्रश्न हमेशा से ही विचारणीय रहा है कि मजबूत, प्रभावी और साथ में लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करने वाली सरकार किसे समझा जाना चाहिए- एक पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार को, या फिर किसी ऐसी गठजोड़ सरकार को।

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भारतीय लोकतंत्र में यह प्रश्न हमेशा से ही विचारणीय रहा है कि मजबूत, प्रभावी और साथ में लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करने वाली सरकार किसे समझा जाना चाहिए- एक पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार को, या फिर किसी ऐसी गठजोड़ सरकार को जिसमें किसी पार्टी के पास बहुमत नहीं होता। मोदी सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने एक व्याख्यान में कुछ इस तरह की बातें कही हैं जिनसे इस बहस ने सिरे से जोर पकड़ लिया है। चूंकि लोकसभा के चुनाव में छह महीने से भी कम समय रह गया है, इसलिए भी डोभाल जैसे जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा इस जगह उंगली रखना एक तरह से चर्चा को निमंत्रण देना ही है। उन्होंने कहा है कि अगले दस साल तक हम अपनी लोकतांत्रिक विशेषताओं की रक्षा तभी कर सकते हैं जब हमारे पास एक ऐसी सुदृढ़ और निर्णयकारी सरकार हो जो लोकलुभावन मजबूरियों से बचते हुए जनहितकारी निर्णय लेने की हिम्मत दिखा सके। 

जाहिर है कि ऐसी सरकार की आवश्यकता से कोई भी इंकार नहीं करेगा। और, ऐसी सरकार हमारे पास दस साल ही क्यों- हमेशा क्यों नहीं होनी चाहिए? समस्या यह है कि पूर्ण बहुमत और यहां तक कि प्रचंड बहुमत की सरकार भी उन खूबियों की गारंटी नहीं दे सकती जिनका डोभाल ने जिक्र किया है। हमारे लोकतंत्र का इतिहास यही बताता है। मसलन, राजीव गांधी की 1984 की सरकार आजादी के बाद प्रचंडतम बहुमत की सरकार थी, लेकिन अपना कार्यकाल खत्म होते-होते वह अपनी साख खो बैठी और आखिरी दौर में एक कमजोर और घिरी हुई सरकार दिखने लगी। उनसे पहले उनकी मां इंदिरा गांधी की 1971 की उस सरकार का भी यही हश्र हुआ था। बांग्लादेश की जीत के घोड़े पर सवार होकर उन्होंने असाधारण लोकप्रियता हासिल की थी, पर 1974 तक आते-आते चारों तरफ से उनके इस्तीफे की मांग होने लगी थी। इसके ठीक उलट बहुमत के लिहाज से कमजोर समझी जाने वाली सरकारों ने अपने कार्यकाल में उल्लेखनीय उपलब्धियां करके दिखाई हैं। वे अलोकप्रिय समङो जाने वाले फैसले लेने के लिए भी जानी जाती हैं। 

मसलन, 1990 की पी।वी। नरसिंह राव की सरकार बाहरी समर्थन पर निर्भर थी, लेकिन उसने अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही अर्थव्यवस्था का चेहरा बदलने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए और उनमें कामयाब भी रही। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी की गठजोड़ सरकार किसी भी दृष्टि से फैसलों और पहलकदमी के लिहाज से कमजोर सरकार नहीं थी। थोड़ी सी सीटों से चुनाव हार जाने के पहले कोई कल्पना भी नहीं कर पा रहा था कि कांग्रेस उसे पराजित कर सकती है। इस सरकार ने पाकिस्तान से संबंध अच्छे बनाने के लिए असाधारण पहलकदमियां लीं, और अमेरिका का दबाव ङोलते हुए दिखाया कि एक स्वतंत्र विदेश   नीति का संचालन कैसे कियाजाता है। 

मौजूदा सरकार को ही देखिए, 2014 में तीस साल बाद किसी एक पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ, और मोदी सरकार हर तरह से एक मजबूत सरकार की छवि के साथ सत्ता में आई। 2017 में उत्तर प्रदेश के चुनाव में जीत हासिल होने तक यह लगता रहा कि यह वास्तव में एक मजबूत सरकार है और दिल्ली और बिहार के अपवादों को छोड़ कर लगातार चुनाव पर चुनाव जीत रही है। लेकिन, पिछले छह महीनों से इस सरकार के रुतबे में खासी गिरावट आ गई है। 

सीबीआई प्रकरण के आईने में देखने पर तो ऐसा लगता है कि सरकार अपनी साख को लेकर अंदेशों का शिकार हो गई है। ऐसा कभी देखा ही नहीं गया कि देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं दो आईपीएस अफसरों के बीच झगड़े को निजी स्तर पर निबटाने की कोशिश की हो। क्या विचित्र नजारा है। गृह मंत्री को छोड़ कर (जिन्हें इस मसले में सक्रिय होना चाहिए था) प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और कानून मंत्री ने इस मसले में खुद को अनावश्यक रूप से फंसा लिया है। इसके कारण लोगों को तरह-तरह की अटकलें लगाने का मौका मिल गया है। यह पहली बार है कि मोदी सरकार में ऐसा रणनीतिक झोल दिखा है। इसी तरह से यह सरकार राफेल विमान के खरीद सौदे से जुड़े विवादों को निबटाने में कुशलता का परिचय देने में नाकाम रही है और इसी कारण से विपक्ष को पहली बार उसके खिलाफ प्रचार करने का मसाला मिल गया है।

इन उदाहरणों से लगता है कि सरकार संख्या की दृष्टि से स्थिर होते हुए भी निष्प्रभावी हो सकती है, और संख्या की दृष्टि से दुर्बल होते हुए भी वह अपने दबदबे को कायम रख सकती है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह एक पार्टी के बहुमत की सरकार है या गठजोड़ की। शर्त यह है कि उसकी नेतृत्वकारी शक्तियों को सरकार चलाना आना चाहिए। 

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