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डॉक्टर विजय दर्डा का ब्लॉग: अब राम राज भी आना चाहिए

By विजय दर्डा | Updated: January 29, 2024 06:44 IST

प्राण प्रतिष्ठा की तारीख 22 जनवरी 2024 को दिवाली की तिथि न होते हुए भी रौशनी से सारा देश जगमगा उठा क्योंकि अयोध्या में सैकड़ों साल की तपस्या, संघर्ष और बलिदान के बाद मंदिर बना है।

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ठळक मुद्देप्राण प्रतिष्ठा के दिन अयोध्या में रामलला नहीं आए हैं बल्कि पूरे देश में मानवता का मंदिर बना है22 जनवरी 2024 को दिवाली की तिथि न होते हुए भी रौशनी से सारा देश जगमगा उठाप्रभु श्रीराम के व्यक्तित्व में समाहित आचरण, हमें सदैव मनुष्यता का पाठ पढ़ाता है

करीब 300 करोड़ साल की उम्र वाली कृष्णशिला से उकेरी गई प्रभु श्रीराम की मूर्ति में जब प्राण प्रतिष्ठा हो रही थी तो न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की निगाहें अयोध्या पर टिकी थीं। देश में ऐसा उल्लास भारत की आजादी के बाद शायद ही किसी ने कभी देखा हो! प्राण प्रतिष्ठा की तारीख 22 जनवरी 2024 को दिवाली की तिथि न होते हुए भी रौशनी से सारा देश जगमगा उठा क्योंकि अयोध्या में सैकड़ों साल की तपस्या, संघर्ष और बलिदान के बाद मंदिर बना है। केवल अयोध्या में रामलला नहीं आए हैं बल्कि पूरे देश में मानवता का मंदिर बना है।

मैं इस बात में नहीं जाता कि इसका राजनीतिक पक्ष क्या है। धारा 370 के संदर्भ में भी मैंने कहा था कि देश की अखंडता और सुरक्षा के मद्देनजर उसे हटाना बड़ी जरूरत थी भले ही उसका लाभ किसी को मिलता हो तो मिले। निश्चय ही प्रभु श्रीराम के मंदिर का एक राजनीतिक पक्ष भी है लेकिन क्या केवल राजनीतिक कारणों से एक मंदिर के निर्माण से जन-जन में इतना बड़ा उल्लास प्रवाहित हो सकता है? सर्दियों में ठिठुरती हुई भीड़ के उमंग के पीछे प्रभु श्रीराम के व्यक्तित्व में समाहित वह आचरण है जो हमें मनुष्यता का पाठ पढ़ाता है। हम जिस कल्याणकारी राज्य की कल्पना करते आए हैं, उसी को तो राम राज कहा जाता है। राम सच्चे अर्थों में मानवता के नायक हैं।

प्रभु श्रीराम के जीवन को यदि विश्लेषणात्मक नजरिये से देखें तो वे स्पष्ट रूप से वनवासियों,  शोषितों और वंचितों के नायक नजर आते हैं। अयोध्या से वनवास के लिए निकले तो उन्होंने कांटों से भरा मार्ग इसलिए चुना ताकि आम आदमी के कष्टों को समझ सकें। उनकी सरलता देखिए कि वे केवट से नदी पार करवाने की याचना करते हैं और नदी पार पहुंचने पर कृतज्ञता भाव से केवट को गले भी लगाते हैं। वे शबरी के जूठे बेर खाकर भावविभोर हो जाते हैं। अपने 14 साल के वनवास में वे वनवासियों को एकजुट करते नजर आते हैं। वे एक राजपुत्र थे और चाहते तो माता सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए अपने भाई भरत को बुला सकते थे जो उनकी खड़ाऊं रखकर शासन चला रहे थे या फिर दूसरे साम्राज्यों से सैन्य मदद ले सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

प्रभु श्रीराम ने वनवासियों और जनजातीय समुदायों को एकत्रित करके अपनी सेना बनाई। सैन्य संगठन और सामाजिक एकजुटता का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण किसी भी देश के इतिहास में नहीं मिलता है। यही कारण है कि वे आदिवासियों के लोकगीतों और श्रुति कथाओं में भी व्यापकता के साथ मौजूद हैं। श्रीराम की व्यापकता केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय प्रायद्वीप में है। कंबोडिया, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, सुमात्रा, थाईलैंड, मलेशिया, लाओस के साथ ही दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम राष्ट्र इंडोनेशिया की संस्कृति में भी प्रभु श्रीराम मौजूद हैं।

इंडोनेशिया के बाली में बड़े पैमाने पर रामलीला का मंचन होता है। प्रभु श्रीराम के आचरण की एक और बड़ी खासियत नजर आती है और वह है साम्राज्यवाद विरोधी होना! प्रभु श्रीराम चाहते तो बालि का वध करने के बाद किष्किंधा और रावण वध के बाद श्रीलंका को अयोध्या का उपनिवेश बना सकते थे लेकिन उन्होंने किष्किंधा सुग्रीव को और श्रीलंका विभीषण को दे दी। आज विश्व का हर देश श्रीराम की तरह आचरण करने लगे तो ये जो खून की नदियां बह रही हैं, आदमी ही आदमी को मार रहा है, वह खत्म हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट से न्याय की मुहर लगने के बाद ऐसे प्रभु श्रीराम का उनके जन्मस्थान अयोध्या में मंदिर बनने से कौन हर्षित नहीं होगा?  यह केवल सनातन धर्म का मंदिर नहीं है बल्कि अयोध्या तो जैन, बौद्ध और सिखों के लिए भी आराध्य स्थल है। यह जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के साथ ही तीन और  तीर्थंकरों की पुण्य भूमि है। कुछ लोगों की मान्यता है कि इस पूरे प्रसंग में एक समुदाय के साथ अन्याय हुआ है।

मैं पूरे देश की बात तो नहीं जानता लेकिन अयोध्या के मेरे एक मित्र ने मुझसे यह जरूर कहा कि हमारे पुरखों की जिंदगी संघर्ष करते हुए खत्म हो गई लेकिन अब हमें इस मंदिर से रोजी-रोटी मिलेगी। भूख कोई मजहब नहीं देखती। अब श्रीराम के नारे में आक्रोश नहीं बल्कि सद्भावना और करुणा का भाव दिख रहा है। अयोध्या के मुस्लिम इस बात से सुकून में हैं कि मंदिर के कारण अयोध्या की सूरत बदल गई है।

देश  के हर हिस्से को जोड़ने वाली सड़कें बन गई हैं। दुनिया से जोड़ने के लिए एयरपोर्ट बन गया है। नए होटल खुल रहे हैं। धर्मशालाएं बन रही हैं। हर तरह के रोजगार का अवसर उत्पन्न हो रहा है। पूरी इकोनॉमी बदल रही है। हर साल लाखों टूरिस्ट आएंगे। हजारों हाथों को काम मिलेगा। जितने लोग गोवा नहीं गए, उतने अयोध्या पहुंचे हैं। भविष्य में यह वैटिकन का स्वरूप ग्रहण कर लेगा।

तो अब सबसे बड़ा सवाल है कि मंदिर बन चुका है तो भविष्य की अपेक्षा क्या है? अब अपेक्षा संपूर्ण राम राज की है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बिल्कुल सही कहा कि हमें मंदिर से समरसता, सद्भाव,  मैत्रीभाव और धर्मनिरपेक्षता की प्रेरणा लेनी चाहिए और   पराक्रम, पुरुषार्थ और समर्पण का प्रसाद चढ़ाना चाहिए। यही राम राज की कल्पना है।

रोम-रोम से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी राम राज की बात करते थे। वास्तविक अर्थों में शोषितों, वंचितों और उपेक्षितों की किस्मत बदलने वाला राम राज लाना है तो सत्ता के साथ हमें भी अपना दायित्व निभाना होगा। तभी पूरी पवित्रता के साथ कह पाएंगे- जय श्रीराम!

टॅग्स :राम मंदिरLord Ramअयोध्या
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