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मजदूर दिवस: क्या बदलते जमाने के साथ कम हो गई है श्रमिकों की समस्याएं?

By योगेश कुमार गोयल | Updated: May 1, 2023 11:01 IST

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उद्योग, व्यापार, भवन निर्माण, पुल, सड़कों का निर्माण, कृषि इत्यादि समस्त क्रियाकलापों में श्रमिकों के श्रम का महत्वपूर्ण योगदान होता है और वर्तमान मशीनी युग में भी उनकी महत्ता कम नहीं है. सही मायनों में विश्व की उन्नति का दारोमदार इसी वर्ग के मजबूत कंधों पर होता है. किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति तथा राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का प्रमुख भार श्रमिक वर्ग के कंधों पर होता है. समाज के इसी वर्ग के लिए प्रतिवर्ष एक मई को ‘अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ अथवा ‘मजदूर दिवस’ मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है. 

भारत में श्रमिक दिवस मनाए जाने की शुरुआत किसान मजदूर पार्टी के कामरेड नेता सिंगारावेलू चेट्यार के सुझाव पर 1 मई 1923 को हुई थी. उनका कथन था कि चूंकि दुनियाभर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं इसलिए भारत में भी इसे मनाया जाना चाहिए. इस प्रकार भारत में एक मई 1923 से मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मान्यता दी गई.

श्रमिक वर्ग अपनी हाड़-तोड़ मेहनत के बलबूते पर राष्ट्र के प्रगति चक्र को तेजी से घुमाता है लेकिन कर्म को ही पूजा समझने वाला यह वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है. देश की स्वाधीनता के साढ़े सात दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी अनेक श्रम कानूनों को अस्तित्व में लाने के बावजूद हम ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर पाए हैं, जो मजदूरों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिला सके. 

भले ही इस संबंध में कई कानून बने हैं किंतु श्रमिक वर्ग की समस्याएं कम नहीं हैं. हालांकि सच यह भी है कि अधिकांश श्रमिक या तो अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ होते हैं या वे अपने अधिकारों के लिए इस कारण आवाज नहीं उठा पाते कि कहीं इससे नाराज होकर उनका मालिक उन्हें काम से न निकाल दे और उनके परिवार के समक्ष भूखे मरने की नौबत आ जाए.

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