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डॉ. एसएस मंठा का ब्लॉग: क्या विवाह की प्रासंगिकता खत्म हो रही है?

By लोकमत न्यूज़ ब्यूरो | Updated: October 13, 2018 15:40 IST

आईपीसी की धारा 497 पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले व्यभिचार और समलैंगिक संबंधों के अपराध नहीं होने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ा है और यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि हमारे जीवन में विवाह की पवित्रता क्या है? इ

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डॉ. एसएस मंठा

व्यभिचार और समलैंगिक संबंधों के अपराध नहीं होने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ा है और यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि हमारे जीवन में विवाह की पवित्रता क्या है? इस वर्ष एक ही समाज के 85 युगलों का विवाह हुआ। सामूहिक विवाह समारोह के आयोजन की ऐसी कई खबरें सामने आती हैं। लेकिन सवाल उठता है कि वर्तमान परिस्थितियों में विवाह कैसे टिक पाएंगे?

पुरानी कहावत है कि ‘विवाह स्वर्ग में ही तय हो जाते हैं’। शादीशुदा लोगों के लिए साल में एक बार एक खूबसूरत पल आता है जब वे अपने विवाह की वर्षगांठ मनाते हैं और साथ रहते हुए जीवन के उतार-चढ़ावों का सामना करते हैं। क्या उनका प्यार मानवीय पसंद और समझ से परे है? क्या विवाह सिर्फ एक धार्मिक रीति है? प्रेम का रूपांतर जब विवाह में होता है तो क्या वह पहले से ही स्वर्ग में तय हो चुका होता है? क्या विवाह में प्रेम का विशेष सारतत्व बचा रहता है?

विवाह में प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी- दोनों चीजें शामिल होती हैं। विवाह के बंधन में नहीं बंधने वाला व्यक्ति भी क्या प्रेम और जिम्मेदारी की कसौटी पर खरा उतर सकता है? अगर सिर्फ प्रेम ही संबंधों के लिए पर्याप्त होता तो ज्यादातर लोगों को आज समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता। विवाह संस्था के सामने जैसी चुनौती आज है, वैसी पहले कभी नहीं थी।

ऐसा प्रतीत होता है कि पुरानी पीढ़ी के बीच उपजने वाले असंतोष का स्थान तलाक ने ले लिया है। लिव इन संबंधों की वजह से विवाह संस्था प्रभावित हो रही है। विवाह को एक ऐसी संस्था के रूप में देखा जाने लगा है जिसमें दो स्त्री-पुरुष साथ रहते हैं और दोनों एक-दूसरे की स्वतंत्रता को खत्म कर देते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि वे दोनों अपनी स्वतंत्रता गंवाते नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते हैं।

हममें से कई लोगों को लगता है कि जिससे हम प्यार करते हैं उससे विवाह होने पर अबाधित प्रणय, भावनोत्कटता और निकटता का अधिकार मिल जाता है, लेकिन जरूरी नहीं है कि ऐसा ही हो। प्रेम ऐसे पीठ दर्द के समान हो सकता है जो एक्स-रे में दिखाई नहीं देता, फिर भी उसका अस्तित्व होता है।

पहले तकरार, बाद में प्यार

कई जोड़े शुरू में बेमेल दिखाई देते हैं लेकिन बाद में वे सुखपूर्वक रहते हैं। इसके विपरीत कई लोग प्रेम में पड़कर विवाह करते हैं लेकिन उस विवाह का अंत तलाक में जाकर होता है। विवाह की सफलता के लिए दोनों के स्वभाव का एक समान होना जरूरी नहीं है, बल्कि अपने अहंकार को परे रखने की जरूरत है। यह अहंकार इन बातों से पैदा हो सकता है कि दोनों में से किसकी तनख्वाह ज्यादा है, किसको ज्यादा प्रसिद्धि मिलती है आदि। इसलिए इन बातों को नजरंदाज कर प्यार के बंधन को ध्यान में रखना चाहिए।

एक दूसरे का मददगार बनना, अनुभव साझा करना, संबंधों का सम्मान करना, त्याग करना, समझौता करना और यह सब करते हुए जीवन में रोमांस बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है। क्या इस तरह के प्रयासों में स्वर्ग कोई भूमिका  निभाता है?

तो क्या तलाक भी स्वर्ग में ही तय होते हैं और पृथ्वी पर निष्पादित किए जाते हैं? जब तलाक मंजूर होता है तो दोनों के ही जीवन में एक-दूसरे के प्रति अच्छे मनोभाव खत्म हो जाते हैं। भारत में अनेक विवाहों का पंजीयन नहीं होता। फिर भी उनके बीच तलाक होते हैं। हमारे देश में 20 प्रतिशत विवाहों की परिणति तलाक के रूप में होती है। अमेरिका में यह अनुपात 50 प्रतिशत है। हम जहां विवाह की प्रासंगिकता पर बहस करते हैं, वहीं कुछ ऐसे देश भी हैं जहां तलाक की अनुमति नहीं मिलती है।

वर्तमान पीढ़ी प्रयोगशील है, इसलिए लिव-इन संबंधों के बारे में प्रयोग कर रही है। ऐसे संबंधों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है और उसका असर सामाजिकता पर पड़ रहा है। लेकिन ऐसे संबंधों में स्त्री के शोषण की संभावना अधिक होती है। तो क्या आज के युवाओं को विवाह के किसी अलग ही मॉडल की  जरूरत है? आज विवाह को जरूरी नहीं समझा जा रहा है। जन्म लेने वाले ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ रही है जिनके माता-पिता विवाहित नहीं हैं।

क्या इसका अर्थ उस वंशक्रम का अंत है जिसे हम जानते हैं? विवाहित नहीं होते हुए भी एक साथ रहने वाले जोड़ों का पंजीयन किस प्रकार होगा? उन माताओं के बारे में क्या जो अपने बच्चों के पिता के साथ नहीं रहती हैं? क्या हमें लोगों को ट्रैक करने के लिए एक नई प्रणाली स्थापित करनी होगी? इन सब अप्रिय सवालों के जवाब खोजने की जरूरत है।      

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