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India-Maldives row: राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज्जू का चीन प्रेम सिर चढ़कर बोल रहा, मालदीव ने पार की एहसान-फरामोशी की हद

By विकास मिश्रा | Updated: January 11, 2024 11:27 IST

India-Maldives row: भारत से मालदीव की दूरी महज 820 किलोमीटर है जबकि चीन से उसकी दूरी 4 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा है.

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ठळक मुद्दे मालदीव संकट में आया तो भारत ही तारणहार बनकर वहां पहुंचा है. मालदीव को एहसान-फरामोशी के रास्ते पर ले जाने के लिए निश्चय ही चीन ने उन्हें प्रलोभन दिया होगा.मोइज्जू ने अपना चुनाव ‘इंडिया आउट’ के नारे के साथ लड़ा था.

India-Maldives row:मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज्जू का चीन प्रेम सिर चढ़कर बोल रहा है लेकिन हकीकत यही है कि हर संकट के समय मालदीव का साथ भारत ने दिया है, न कि चीन ने! चीन चाहे भी तो भारत से जल्दी वहां नहीं पहुंच सकता क्योंकि भारत से मालदीव की दूरी महज 820 किलोमीटर है जबकि चीन से उसकी दूरी 4 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा है.

यही कारण है कि जब भी मालदीव संकट में आया तो भारत ही तारणहार बनकर वहां पहुंचा है. मालदीव को एहसान-फरामोशी के रास्ते पर ले जाने के लिए निश्चय ही चीन ने उन्हें प्रलोभन दिया होगा लेकिन यह कितना भारी पड़ने वाला है, यह उनकी समझ में नहीं आ रहा है. मोइज्जू ने अपना चुनाव ‘इंडिया आउट’ के नारे के साथ लड़ा था.

उनका कहना है कि भारत के जो 77 सैनिक वहां रह रहे हैं, उन्हें भारत वापस बुलाए. सवाल यह है कि ये सैनिक वहां करते क्या हैं? निश्चय ही वे टोही विमानों से हिंद महासागर की निगरानी करते हैं लेकिन मोइज्जू यह क्यों भूल गए कि ये सैनिक अपने डोर्नियर विमान और हेलिकॉप्टर से मालदीव के 200 छोटे-छोटे द्वीपों से मरीजों को अस्पताल पहुंचाने का काम करते हैं.

हो सकता है कि चीन ने इससे ज्यादा सहूलियत देने की बात की हो और मोइज्जू उस प्रलोभन में आ गए हों. मामला चाहे जो भी हो लेकिन मोइज्जू जो कर रहे हैं, उससे मालदीव संकट में ही फंसने वाला है. भारत के लिए मालदीव सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और अपने सैनिकों को वहां से वापस लाकर हम चीन के लिए खुला समुद्र नहीं छोड़ सकते!

हालांकि मौजूदा स्थिति में चीन वहां नहीं आ सकता लेकिन वह कोशिश तो कर ही रहा है! ऐतिहासिक तथ्य यही है कि हर संकट के समय भारत ही मदद के लिए मालदीव पहुंचा है. 1988 में मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम के खिलाफ पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम का साथ लेकर मालदीव के व्यापारी अब्दुल्ला लुथूफी और उसके साथी सिक्का अहमद इस्माइल मानिक ने विद्रोह कर दिया था. माले के हुलहुले हवाई अड्डे और टेलीफोन एक्सचेंज पर कब्जा कर लिया था.

गयूम की जान संकट में थी लेकिन राजीव गांधी के निर्देश पर भारतीय सेना के कमांडो ने तत्काल वहां पहुंच कर विद्रोह को असफल कर दिया. सुनामी के समय जब मालदीव के तट तबाह हो गए थे तब मदद के लिए भारत ही पहुंचा था. न केवल राहत सामग्री पहुंचाई गई बल्कि एक अस्पताल भी स्थापित किया गया था.

उस राहत अभियान पर भारत ने करीब 37 करोड़ रुपए खर्च किए थे. व्यवस्था को सुधारने के लिए भारत ने मालदीव को 10 करोड़ रुपए अलग से दिए. नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भी मालदीव को हर तरह से मदद देने की नीति जारी रही. दिसंबर 2014 में मालदीव के सबसे बड़े वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में आग लग गई और माले बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने लगा तब मालदीव के आग्रह पर भारत ने 6 विमानों के माध्यम से और बाद में पानी के जहाज से भरपूर पानी पहुंचाया. इतना ही नहीं, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट को ठीक करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

कोविड के समय भारत ने मालदीव की हर तरह से सहायता की. मेडिकल टीम भेजी और  दवाइयां पहुंचाईं. भारत में वैक्सीन लगाने की शुरुआत होने के साथ ही भारत ने तत्काल मालदीव को भी टीके नि:शुल्क उपलब्ध कराए. न केवल पहला डोज बल्कि दूसरे डोज के लिए भी भारत ने टीके उपलब्ध कराए. कोविड के समय भारत ने मालदीव को करीब 2 हजार करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की.

इसके अलावा भी भारत हर संभव सहायता करता रहा है. हम भारतीयों के संस्कार ऐसे हैं कि हम मदद करते हैं पर कभी एहसान नहीं जताते लेकिन जब कोई देश एहसान-फरामोश हो जाए तो उसे याद दिलाना बहुत जरूरी है कि यदि हमें तुम्हारी जरूरत है तो तुम्हें हमारी ज्यादा जरूरत है. मोइज्जू को जल्दी अक्ल आ जाए तो दोनों देशों का भला है. अन्यथा चीन तो मजे लेने के मूड में है ही!

टॅग्स :मालदीवचीन
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