Field Marshal Sam Manekshaw: सन् 1914 में तीन अप्रैल को (यानी आज के ही दिन) पंजाब के ऐतिहासिक अमृतसर शहर के एक संभ्रांत पारसी परिवार में पैदा हुए भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ (1971 के युद्ध में जिनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के लगभग एक लाख शस्त्रसज्जित सैनिकों के आत्मसमर्पण के रास्ते उसके दो टुकड़े करने और पूर्वी हिस्से को अलग बंगलादेश बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई) को हमारे बीच से गए 18 साल होने को हैं. लेकिन कृतज्ञ देशवासियों ने उन्हें अपनी यादों में अभी भी जिंदा रखा है.
यह विश्वास करने के कारण हैं कि आगे भी जिंदा रखेंगे. सच पूछिए तो दुनिया की किसी भी सेना का शायद ही कोई और फील्ड मार्शल या जनरल होगा, जिसने अपने देश में उनके जितनी लोकप्रियता हासिल की हो. आज भी देश में कहीं उनकी बात चल भर जाए तो लोग उत्साहित होकर बताने लगते हैं कि भारतीय सेना के इस पहले फाइवस्टार जनरल को उनके दोस्त, पत्नी, अफसर और मातहत ही नहीं, नाती वगैरह यानी नई पीढ़ी के लोग भी ‘सैम’ या ‘सैम बहादुर’ कहकर पुकारा करते थे. निस्संदेह, उनके व्यक्तित्व में निडरता व बहादुरी के साथ सहजता व विनोदप्रियता के मणिकांचन संयोग की वजह से.
अपने चार दशक के सैन्य करियर में सैम ने कुल मिलाकर पांच युद्धों में अपनी सेवाएं दी थीं. इनमें दूसरा विश्वयुद्ध, विभाजन के वक्त पाकिस्तान से हुई भिड़ंत, 1962 में चीन से हुआ युद्ध और 1965 व 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध शामिल हैं. युद्धों में उन्होंने कई बार गोलियां खाईं और गंभीर रूप से घायल हुए लेकिन कभी भी साहस व दृढ़ता का साथ नहीं छोड़ा.
1942 में बर्मा (अब म्यांमार) में सितांग नदी के तट पर जापानियों को पेगू व रंगून की ओर धकेलने के अभियान के दौरान घायल होने के बावजूद प्रदर्शित अद्भुत साहस व नेतृत्व के लिए उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया, लेकिन दूसरी बार बहुत गंभीर रूप से घायल होने पर चिकित्सा के लिए भारत वापस ले आया गया.
बताते हैं कि उनको सात गोलियां लगी थीं, जिसके चलते उनकी प्राणरक्षा की कतई उम्मीद नहीं रह गई थी. लेकिन उनकी जीवनी शक्ति इतनी प्रबल थी कि मौत उनके पास फटक नहीं पाई और वे बच गए. 1971 के शुरुआती महीनों में पाकिस्तान की हरकतों से आजिज तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि गर्मियों में ही उस पर हमला बोल दिया जाए.
लेकिन सेनाध्यक्ष के तौर पर सैम ने उनसे असहमति जताते हुए हमले की तैयारी के लिए छह महीने मांगे और आश्वस्त किया कि इन छह महीनों में वे सेना की तैयारियों को उस स्तर तक पहुंचा देंगे कि जीत अवश्यंभावी हो जाएगी. अंततः उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया. तीन दिसंबर,1971 को युद्ध शुरू हुआ और तेजी से बढ़त बनाते हुए 13 दिसंबर, 1971 को ढाका में उन्होंने पाक सेना को चेताया कि या तो वह आत्मसमर्पण कर दे या अपने खात्मे के लिए तैयार हो जाए.
इस चेतावनी के तीन ही दिन बाद पाक सेना के 93 हजार सैनिकों ने अपनी पूर्वी कमान के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी की अगुआई में भारतीय सेना की पूर्वी कमान के मुखिया लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाल दिए थे.