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राजनीतिक चिंता में पर्यावरण का स्थान कहां?

By अभिषेक कुमार सिंह | Updated: November 19, 2024 05:42 IST

Delhi Pollution: हमारे देश का हर नागरिक अब भलीभांति परिचित है कि इन पाबंदियों से कुछ हासिल नहीं होने वाला है.

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ठळक मुद्देसारी पाबंदियां, अदालती फटकार और सरकारों के दृढ़ निश्चय अंदर से खोखले हैं. जनता एक बार फिर तरह-तरह के प्रदूषणों के सामने निरुपाय छोड़ दी जाती है. उत्तर भारत का लोकप्रिय पर्व छठ संपन्न हुआ.

Delhi Pollution: देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर गंभीर वायु प्रदूषण का सामना कर रही है. हवा की बेहद खराब हालत में खांसते-हांफते नागरिकों को रस्मी तौर पर राहत देने के लिए सरकार ने कुछ पाबंदियां लागू कर दी हैं. जैसे ग्रेडेड रेस्पॉन्स एक्शन प्लान (जीआरपी) का तीसरे चरण वाला प्रतिबंध आयद कर दिया गया है. पांचवीं तक के स्कूल बंद कर उनकी ऑनलाइन कक्षाओं के आयोजन का निर्देश दिया गया है. केंद्र, दिल्ली सरकार और नगर निगम के दफ्तरों के समय में थोड़ी तब्दीली की गई है, ताकि कर्मचारियों के आवागमन के कारण सड़क पर ट्रैफिक और उससे होने वाले प्रदूषण में कुछ कमी आ सके. लेकिन हमारे देश का हर नागरिक अब भलीभांति परिचित है कि इन पाबंदियों से कुछ हासिल नहीं होने वाला है.

ये सारी पाबंदियां, अदालती फटकार और सरकारों के दृढ़ निश्चय अंदर से खोखले हैं. मौसम बदलने के साथ प्रदूषण में नरमी आते ही ये सारी प्रतिज्ञाएं और प्रतिबंध हवा हो जाते हैं और जनता एक बार फिर तरह-तरह के प्रदूषणों के सामने निरुपाय छोड़ दी जाती है. हाल ही में, उत्तर भारत का लोकप्रिय पर्व छठ संपन्न हुआ. इस त्यौहार के दौरान हर साल की तरह रासायनिक कचरे और झाग में पूरी तरह लिपटी हुई यमुना नदी की तस्वीरें हर जगह छाई रहीं. कुछ अबोध महिलाएं रासायनिक झाग को शैंपू समझ उससे अपने बालों की सफाई करते दिखाई दीं.

सोशल मीडिया पर हजारों ने इन तस्वीरों को देख चिंता प्रकट की कि आखिर यमुना नदी कब साफ होगी. कब उसका जल आचमन लायक होगा. उधर छठ के आयोजन से पहले ही अदालत ने चेता दिया था कि यमुना की हालत ऐसी नहीं है कि उसमें उतरकर पूजा की जाए या उसमें डुबकी लगाई जाए. बात चाहे पानी की हो, हवा की हो या जमीन की- उनसे जुड़ा प्रदूषण घटने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है.

यमुना की सफाई में ही बीते दशकों में करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं. दिल्ली की हवा को दुरुस्त करने के लिए प्रतिबंध लगाने के अलावा स्मॉग टावरों की स्थापना हो चुकी है. पड़ोसी राज्यों में पराली (खेती के अवशेष) जलाने पर रोक के फरमान कई बार जारी हो चुके हैं. लेकिन कोई उपाय कारगर नहीं हो रहा है.

प्रदूषण पर लगाम लगाने को लेकर पैदा हो रही जो मुश्किलें अदालतों, सरकारों, संबंधित संगठनों की चिंता में हैं, उनसे जुड़ा कोई समाधान आखिर क्यों नहीं निकल पा रहा है. असल में, इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहली मुख्य वजह यह है कि पर्यावरण प्रदूषण का मुद्दा हमारी राजनीतिक चिंतन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है या यह मसला राजनीतिक क्षितिज से पूरी तरह गायब ही है.

जाति, धर्म और कथित विकास की बात करने वाले राजनीतिक दल पर्यावरण की सार-संभाल और प्रदूषण की रोकथाम के मुद्दों की न तो कोई चर्चा करते हैं और न ही इनसे जुड़े वादों को अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल करते हैं. चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभाओं के चुनाव हों, राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की ओर से शायद ही कोई ऐसा आश्वासन या वादा सामने आया है.

जिसमें प्रदूषण खत्म करते हुए नागरिकों को साफ हवा-पानी देने की बात कही गई हो. दिल्ली जैसी जगहों पर ग्रेडेड रेस्पॉन्स एक्शन प्लान के क्रमशः चार चरणों में पाबंदियां लगाने और छूट देने का उपक्रम जारी रहता है, लेकिन विभिन्न चरणों में होने वाले चुनावों के दौरान राजनीतिक दल प्रदूषण से राहत दिलाने की कोई घोषणा नहीं करते हैं- जिसकी आज ज्यादा जरूरत है.

कोई राजनेता या उसका राजनीतिक दल यह ऐलान करते दिखाई नहीं देता कि अगर वे सत्ता में आए तो पानी के संकट, पर्यावरण के प्रदूषण, कचरे की बढ़ती समस्या से कैसे निजात दिलाएंगे और साफ हवा-पानी का पर्यावरणीय संकल्प कैसे ले पाएंगे. असल में, पर्यावरण और विज्ञान संबंधी मुद्दों को चुनावी प्रक्रिया में चर्चा का हिस्सा बनाने की इस पहलकदमी पर एक नजर इस साल प. बंगाल के पर्वतीय क्षेत्र दार्जिलिंग में बढ़ते प्रदूषण के कारण पर्यावरण पर हो रहे असर के मद्देनजर गई थी.

वहां लोकसभा चुनावों के दौरान पश्चिम बंगाल के कुछ राजनीतिक दलों ने पर्यावरण संतुलन कायम करने की मांग को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग की थी. इसके पीछे मशहूर पर्यटन स्थल दार्जिलिंग की बिगड़ती आबोहवा है. एक रिपोर्ट का दावा है कि दार्जिलिंग और नजदीकी जगहों पर पर्यटकों की बढ़ती भीड़ ने प्रदूषण को खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया है.

जिससे स्थानीय लोग परेशानी महसूस करने लगे हैं. राजनीतिक पटल पर पर्यावरण की आवाज को मुखर करने के पीछे एक बड़ी भूमिका लद्दाख क्षेत्र में प्रख्यात पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का आंदोलन है. वांगचुक ने बिगड़ते पर्यावरण का हवाला देकर लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग के साथ इसी साल 21 दिन तक भूख हड़ताल की थी जिसे विश्वव्यापी चर्चा मिली.

वे छठी अनुसूची में लद्दाख को शामिल करने के जरिये इस इलाके के पर्यावरण को बचाने का कोशिश कर रहे हैं. वांगचुक के अनुसार छठी अनुसूची स्थानीय संस्कृति को बचाने के लिए रक्षा कवच का काम करती है. लद्दाख और दार्जिलिंग से पर्यावरण सुधार और संरक्षण की राजनीतिक मांग उठना राजनीतिक क्षेत्र में एक सार्थक बदलाव का संकेत देता है, लेकिन अफसोस है कि ऐसी पहलकदमियां बहुत सीमित हैं.

बेंगलुरु भीषण जल संकट से जूझ रहा है, लेकिन कोई राजनीतिक दल इस संकट से उबरने की योजना अपने घोषणापत्र में शामिल करने का जोखिम नहीं ले सका है. महाराष्ट्र और बुंदेलखंड के कई इलाके भयानक सूखे की मार झेलते हैं, लेकिन किसी राजनीतिक दल या नेता में यह साहस नहीं दिखा है कि उन्होंने अपने चुनावी वादों में इसका कोई उल्लेख किया हो.

इधर झारखंड विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, पर वहां अवैध खनन और वनों की कटाई से लेकर झरिया, धनबाद, रांची के प्रदूषण का जिक्र भूले से भी किसी राजनीतिक दल में एक मुद्दे के रूप में नहीं किया. इस राज्य में प्रदूषण के कारणों में कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैस, वाहनों का धुआं और झिरी डंपिंग यार्ड से निकलने वाला धुआं शामिल है, पर जाति-धर्म पर वोट मांगने वाले राजनेताओं को ये मुद्दे दिखते ही नहीं हैं.

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