अभिलाष खांडेकर
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की हाल ही में हुई कार्यकारी समिति की बैठक ने यह याद दिलाया कि सबसे पुरानी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में अभी भी कुछ जान बाकी है. क्यों? क्योंकि, भाजपा की सुसंगठित संरचना की तुलना में, कांग्रेस में आंतरिक कलह और आपसी साजिशें हमेशा जारी रहती हैं, भले ही हर चुनाव के बाद इसकी स्थिति कमजोर होती जाती हो. कर्नाटक इसका एक उदाहरण है. इसलिए, कांग्रेस को अपने आंतरिक मामलों को सुधारने की जरूरत है और कार्यकारी समिति की बैठकें ऐसे अवसर हैं जो कठिन समय में एकजुटता का प्रदर्शन करते हैं और संगठन को मजबूती देते हैं.
हालांकि विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी सबसे प्रभावशाली चेहरा बने हुए हैं और सही-गलत दोनों कारणों से सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन महाराष्ट्र और बिहार चुनावों में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस कुछ और नीचे फिसल गई है व एक और संकट का सामना कर रही है.
इससे जनता के मन की गहरी धारणा और मजबूत होती है कि कांग्रेस के लिए सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. भाजपा द्वारा बार-बार ‘गांधी परिवार की पार्टी’ कहे जाने वाली कांग्रेस का नेतृत्व पिछले कुछ वर्षों से गैर-गांधी परिवार के दिग्गज नेता मल्लिकार्जुन खड़गे (83 वर्ष) कर रहे हैं. इसलिए, यह आरोप उन पर अब पूरी तरह से सटीक नहीं बैठता, खासकर तब जब भाजपा के कई नेताओं के परिवार के सदस्य भी राजनीति में सक्रिय हैं. एक बार पिता को टिकट मिल जाता है, तो अगली बार बेटे या भतीजे को.
खैर, नए साल की शुरुआत के साथ ही कांग्रेस को भाजपा के उन आरोपों का बेहतर जवाब ढूंढ़ना होगा कि कांग्रेस की राजनीति में नेहरू और गांधी परिवार का ही दबदबा रहा है. भाजपा में लोगों को जिस तरह शीर्ष पद मिलते दिख रहे हैं, वैसे यहां कोई आम कार्यकर्ता नहीं पहुंच सकता. नितिन नबीन इसका ताजा उदाहरण हैं- यह एक अलग मुद्दा है कि वे कितने शक्तिशाली होंगे.
कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना ‘मनरेगा’ से महात्मा गांधी का नाम हटाने के महत्वपूर्ण मुद्दे पर दिसंबर में चर्चा की. समिति ने गांधी के प्रति भाजपा के सम्मान के ढोंग को उजागर करने के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की भी घोषणा की.हालांकि, ‘सीडब्ल्यूसी’ में उठाए गए मुद्दे और श्रमिकों के लिए घोषित कार्यक्रम शशि थरूर और दिग्विजय सिंह के बिल्कुल अलग-अलग बयानों के कारण थोड़े धूमिल हो गए; सिंह ने भाजपा और आरएसएस की खुलेआम प्रशंसा की है.लगातार चुनावी हार ने कांग्रेस को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जहां उसे जमीनी स्तर से खुद को पुनर्जीवित करने के लिए कड़े फैसले लेने होंगे. सोनिया गांधी और खड़गे दोनों ही उम्रदराज नेता हैं. दिग्विजय, कमलनाथ, सिद्धारमैया या हरीश रावत किसी भी मायने में युवा नहीं हैं और पार्टी को कोई बड़ी जीत नहीं दिला सकते.
नए साल के आगमन के साथ ही कांग्रेस को इसलिए अपना पुनर्गठन करना होगा, 2026 के लिए नए ठोस संकल्प लेने होंगे और भारतीय समाज और उसकी समस्याओं से अवगत ईमानदार, प्रतिभाशाली और युवा नेताओं को आगे लाना होगा. तभी वे असीमित धन और प्रशिक्षित व समर्पित कार्यकर्ताओं की विशाल सेना वाली महाकाय भाजपा का मुकाबला कर पाएंगे, जो मजबूत विपक्ष के बिना कई वर्षों तक सरकार में बनी रहेगी. ताकतवर कांग्रस लोकतंत्र के लिए जरूरी है, पर क्या राहुल गांधी इस चुनौती को स्वीकार कर पाएंगे?