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ब्लॉग: असंतुष्ट होने की कीमत! यशवंत सिन्हा को 20 साल बाद चुकाने होंगे 4.25 लाख रुपये

By हरीश गुप्ता | Updated: April 13, 2023 09:53 IST

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वाजपेयी सरकार में वित्त और विदेश मंत्री रह चुके यशवंत सिन्हा को असंतुष्ट होने की कीमत चुकानी पड़ रही है. वे भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे हैं और मौजूदा सरकार से भी उनके मधुर संबंध रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने उनके बेटे जयंत सिन्हा को झारखंड से लोकसभा सीट दी और उन्हें वित्त राज्य मंत्री भी बनाया. लेकिन कहीं कुछ गलत हो गया और वे पार्टी छोड़कर असंतुष्ट हो गए. 

हालांकि उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि करीब 20 साल बाद उन्हें 4.25 लाख रुपए चुकाने पड़ेंगे. एक सुबह उन्हें संपदा निदेशालय से एक नोटिस मिला, जिसमें कहा गया था कि 2004 में जब वह मंत्री नहीं थे तो सरकारी बंगले में समय से अधिक रुके थे.

संपदा निदेशालय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अधीन है और पुरानी फाइलों को खंगालने के बाद उसे पता चला कि सिन्हा 6 कुशक रोड पर रुके थे. यशवंत सिन्हा इस बात से हैरान हैं कि करीब 20 साल बाद इतनी बड़ी रकम की वसूली के लिए सरकार ने उन्हें नोटिस भेजने का फैसला किया. यशवंत सिन्हा की तबीयत ठीक नहीं है और नोएडा में एक घर में रह रहे हैं. हालांकि वह भुगतान करने के मूड में नहीं हैं और वसूली नोटिस का विरोध करने की योजना बना रहे हैं.  

बड़ी पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती बनीं छोटी पार्टियां

अगर आपको लगता है कि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव जीतने की लड़ाई भाजपा और कांग्रेस जैसे दिग्गजों के बीच है, तो आप हैरान रह सकते हैं. कांग्रेस नेतृत्व को उम्मीद है कि 10 मई को 224 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले मतदान में वह अपने दम पर बहुमत हासिल कर लेगी.  उधर भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के साथ सुलह कर ली है और वंशवाद को दूर रखने के अपने अभियान की अनदेखी कर उनके बेटे को विधानसभा का टिकट दिया. येदियुरप्पा का एक और बेटा पहले से ही लोकसभा का सदस्य है. 

वे स्वयं संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति जैसे भाजपा के सबसे शक्तिशाली निकायों के सदस्य हैं. फिर भी किसी को अपने दम पर सरकार बनाने का भरोसा नहीं है. ऐसा लगता है कि भाजपा और कांग्रेस का भाग्य छोटे दलों के हाथों में है. 2018 में भाजपा 35.43% वोट पाकर 104 सीटें जीतने के बावजूद सरकार नहीं बना सकी, जबकि कांग्रेस को सबसे ज्यादा 38.61% वोट हासिल करने के बाद भी 78 सीटें ही मिलीं. 

जद (एस) ने 20.61% के वोट शेयर के साथ 37 सीटें जीतीं. लेकिन 15 महीने में ही सरकार गिर गई और भाजपा के बी.एस. येदियुरप्पा सीएम बन गए. 2023 में, न केवल जद (एस) खेल में वापस आ गई है और जोर आजमाइश कर रही है, बल्कि कई छोटे दल भी मैदान में कूद गए हैं. असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम ने करीब 25 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है और मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है. 

फिर, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया, गली जनार्दन रेड्डी के नेतृत्व वाला कल्याण राज्य प्रगति पक्ष और कई अन्य दल हैं. राष्ट्रीय पार्टी का तमगा मिलने से आम आदमी पार्टी (आप) भी उत्साहित है और दोनों पार्टियों के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है.

नगदी संकट से जूझ रही कांग्रेस

कांग्रेस नेतृत्व भले ही राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की खुमारी में हो लेकिन अब उसे हकीकत का सामना करना पड़ रहा है. और वास्तविकता यह है कि कर्नाटक में पार्टी को मुश्किल हो रही है, जहां विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. राज्य में पार्टी उम्मीदवारों के पास रुपए से भरे बैग ले जाना लगभग असंभव हो गया है क्योंकि आयकर अधिकारियों और अन्य एजेंसियों के 300 से अधिक कर्मचारियों को चौबीसों घंटे कड़ी निगरानी रखने के लिए कर्नाटक में तैनात किया गया है. 

इस मजबूत बल को पुलिस और खुफिया एजेंसियों की सहायता प्राप्त है जो पैसों की आवाजाही पर इतनी कड़ी नजर रख रहा है जैसी पहले कभी नहीं देखी गई थी. मोबाइल फोन पर नजर रखने की रैंडम प्रणाली पहले से कई गुना ज्यादा तेजी से काम कर रही है और सड़क, ट्रेन या हवाई मार्ग से नगदी की आवाजाही इतनी जोखिम भरी हो गई है कि पार्टी ने संसाधन उपलब्ध कराने की अपनी योजना को छोड़ दिया है. 

प्रत्येक उम्मीदवार को सूचित कर दिया गया है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय रूप से धन की व्यवस्था करें और बाद में जब माहौल शांत हो जाएगा तो पार्टी उन्हें धन उपलब्ध कराएगी. हालांकि विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों द्वारा खर्च की मौजूदा सीमा चुनाव आयोग द्वारा 40 लाख रु. तय की गई है लेकिन वास्तविक खर्च करोड़ों में है. 

उम्मीदवार परेशान हैं क्योंकि पार्टी अतीत में अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने के लिए नहीं जानी जाती है. एआईसीसी ने पंजाब और जम्मू-कश्मीर में किराए पर ली गई विज्ञापन और प्रचार एजेंसियों का बकाया नहीं चुकाया है. एक एजेंसी, जिसे भारत-जोड़ो यात्रा के जम्मू-कश्मीर चरण के लिए अनुबंधित किया गया था, ने कांग्रेस अध्यक्ष को कानूनी नोटिस भेजा है.

मंत्रियों के लिए एक और निषिद्ध क्षेत्र

खुफिया एजेंसियों द्वारा सरकार को यह सूचना दिए जाने के बाद कि कुछ मंत्रियों और शीर्ष नौकरशाहों के कुछ रिश्तेदार एनजीओ से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं, आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं. पता चला है कि पीएम मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से कहा है कि उनके रिश्तेदारों को ऐसे गैरसरकारी संगठनों में पदों पर रहने से बचना चाहिए, जो विशेष रूप से विदेशों से धन प्राप्त करते हैं. यदि वे दलितों और विशेष प्रयोजनों के लिए काम करना चाहते हैं, तो वे सरकार द्वारा शुरू की गई विभिन्न योजनाओं से जुड़कर ऐसा कर सकते हैं. 

हाल के दिनों में जिस तरह से गृह मंत्रालय ने एफसीआरए नियमों और प्रक्रियाओं के उल्लंघन के लिए सैकड़ों गैरसरकारी संगठनों पर कार्रवाई की है, उसे देखते हुए राजनीतिक नेताओं और नौकरशाहों के लिए यह एक कड़ा संकेत है.

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