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ब्लॉग: विभिन्न रणनीतियां अपनाती है भाजपा

By अभय कुमार दुबे | Updated: March 20, 2024 11:46 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की प्रबंधन-क्षमता में अगाध विश्वास करने वाले भाजपा प्रवक्ताओं और उनके सहोदरों की भांति टीवी-मंच पर पेश होने वाली समीक्षक-मंडली का विचार है कि मौजूदा सूरत में मोदी की तीसरी जीत को रोका नहीं जा सकता।

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ठळक मुद्देवजह यह है कि विपक्ष की प्रभावी एकता की गैरमौजूदगी में फिलहाल मोदी का पलड़ा भारी लग रहा हैविपक्ष की एकता अगर हो गई होती तो वह मोदी को रोक सकता थाएकता तो अभी आधी-अधूरी है और उसमें कई किंतु-परंतु हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की प्रबंधन-क्षमता में अगाध विश्वास करने वाले भाजपा प्रवक्ताओं और उनके सहोदरों की भांति टीवी-मंच पर पेश होने वाली समीक्षक-मंडली का विचार है कि मौजूदा सूरत में मोदी की तीसरी जीत को रोका नहीं जा सकता। इस दावेदारी में कितना भी एकतरफापन क्यों न हो, आज की तारीख में आकलन करने पर इसे कमोबेश ठीक माना जा सकता है।

वजह यह है कि विपक्ष की प्रभावी एकता की गैरमौजूदगी में फिलहाल मोदी का पलड़ा भारी लग रहा है। विपक्ष की एकता अगर हो गई होती तो वह मोदी को रोक सकता था, पर वह एकता तो अभी आधी-अधूरी है और उसमें कई किंतु-परंतु हैं। भाजपा अलग-अलग राज्यों में विभिन्न रणनीतियां आजमाती है। हर जगह वह अपनी तरफ झुकी जातियों और समुदायों का अपनी राजनीति में टिकट वितरण के जरिये समावेशन करती है, और समाज के जो हिस्से उसके साथ नहीं हैं, उनका बहिर्वेशन करती है। हरियाणा में भाजपा खुले तौर पर जाट-विरोधी और गैर-जाटों की पार्टी बन कर उभरी है, महाराष्ट्र में उसने कई जगहों पर मराठा विरोधी चुनावी गोलबंदी की है और कर्नाटक में वह मुख्य तौर पर लिंगायतों की पार्टी के तौर पर चुनाव लड़ती है। 

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने यादव-जाटव-मुसलमान के त्रिकोण को न केवल अपनी चुनावी राजनीति से दूर रखा है, बल्कि इन तीनों समुदायों के विरोध के आधार पर उसने अपने समर्थन की मुहिम चलाई है। बिहार में भाजपा ने यादवों का बहिर्वेशन किया है। अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी शोध केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक पिछले चुनावों में उप्र में भाजपा ने अपने 45 फीसदी से ज्यादा टिकट ऊंची जाति के उम्मीदवारों को दिए, क्योंकि भाजपा जानती थी कि ये जातियां उसकी सर्वाधिक निष्ठावान समर्थक हैं।

पार्टी हारे या जीते, ये जातियां चुनाव-दर-चुनाव भाजपा को साठ-सत्तर फीसदी के आसपास वोट करती रही हैं। अगर मोटे तौर पर मान लिया जाए कि उत्तरप्रदेश में दस फीसदी यादव हैं, दस फीसदी जाटव हैं और बीस फीसदी मुसलमान हैं, तो प्रदेश की इस चालीस फीसदी जनता को भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति से तकरीबन बहिष्कृत रखा। यह विश्लेषण भाजपा के ऊपर कोई आरोप नहीं है। उसे भी अपनी चुनावी रणनीति बनाने का पूरा हक है।आखिरकार समाजवादी पार्टी अपने ज्यादातर टिकट केवल यादव उम्मीदवारों को देना ही पसंद करती है।

मायावती भी सबसे ज्यादा टिकट जाटवों को देती हैं, हालांकि यह कहना उचित होगा कि बसपा समाज के अन्य तबकों का भी ध्यान रखती है और उसका टिकट वितरण सामाजिक दृष्टि से सर्वाधिक प्रातिनिधिक प्रतीत होता है। स्पष्ट रूप से उत्तर भारत में भाजपा ऊंची जातियों, गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों की पार्टी के तौर पर उभरी है। यह आधे से अधिक हिंदू समाज की भाजपा समर्थक हिंदू एकता का नजारा है। इस हिंदू एकता का एक मकसद है सामाजिक न्याय की तथाकथित ब्राह्मण विरोधी राजनीति को हाशिये पर धकेल देना और दूसरा मकसद है मुसलमानों के वोटों की प्रभावकारिता को समाप्त कर देना। 

 पिछले पांच साल से उत्तर भारत में मुसलमान मतदाता निष्ठापूर्वक भाजपा विरोधी मतदान करने के बावजूद चुनाव परिणाम पर कोई प्रभाव डालने में नाकाम रहे हैं। लोकतंत्र बहुमत का खेल है, और देश में हिंदुओं का विशाल बहुमत है। मुसलमान वोटर किसी बड़े हिंदू समुदाय के साथ जुड़ कर ही चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। उत्तर भारत में मुसलमान मतदाता आम तौर पर पिछड़ी और दलित जातियों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टियों को समर्थन देते रहे हैं।

बाकी जगहों पर वे कांग्रेस के निष्ठावान वोटर हैं। दिक्कत यह है कि कथित रूप से सेक्युलर राजनीति करने वाली इन पार्टियों को हिंदू मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने त्याग दिया है। हिंदू राजनीतिक एकता के तहत 42 से 50 फीसदी के आसपास हिंदू वोट एक जगह जमा हो जाते हैं। 2017 के उत्तरप्रदेश चुनाव में भी यही हुआ था। और इस चुनाव में भी यही हुआ है। अगर इलेक्टोरल इम्पैक्ट फैक्टर (ईआईएफ) के इंडेक्स पर नजर डाली जाए तो साफ जाता है कि उत्तर भारत में जैसे ही चुनावी होड़ में आज तक अदृश्य रहे जातिगत समुदाय ऊंची जातियों और लोधी-काछी जैसे गैर-यादव पिछड़े मतों के साथ जुड़ते हैं। वैसे ही यह इम्पैक्ट फैक्टर भाजपा के पक्ष में झुक जाता है और मुसलमान वोटों के लिए इसका नतीजा शून्य में बदल जाता है। 

हिंदुत्ववादी शक्तियां ठीक यही तो चाहती थीं कि वे इतने हिंदू वोट गोलबंद कर लें कि मुसलमान मतदाताओं की भाजपा विरोधी वोटिंग चुनाव परिणाम पर कोई असर न डाल सके। इस विश्लेषण से जाहिर है कि लोकसभा के चुनाव परिणामों को हमें भाजपा की जीत से आक्रांत मीडिया मंचों की निगाह से न देख कर चालाकी से खेली गई समावेशन और बहिर्वेशन की रणनीति के आईने में देखा चाहिए। हां, भाजपा को यह श्रेय जरूर दिया जा सकता है कि इस जटिल रणनीति को उसने बड़ी खूबी से लागू करके दिखाया।

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