Baramati Bypoll 2026: यह बहुत पुरानी बात नहीं है कि जब कांग्रेस के तत्कालीन राज्यसभा सदस्य राजीव सातव के निधन के बाद उनकी पत्नी प्रज्ञा सातव ने विधान परिषद चुनाव में अपना नामांकन भरा और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी संजय केनेकर ने अपनी पार्टी के नेता देवेंद्र फडणवीस के कहने पर अपना नाम वापस ले लिया था. जिसके बाद सातव निर्विरोध निर्वाचित हुईं. बारामती में होने जा रहे विधानसभा उपचुनाव में भी अपेक्षित यही था कि उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार का चुनाव निर्विरोध होगा. किंतु कांग्रेस ने विधिवत घोषणा कर चुनाव के लिए वातावरण तैयार किया.
जिसके चलते करीब 53 उम्मीदवारों ने नामांकन भरा. मगर असहज स्थितियां उत्पन्न होने के बाद उसके उम्मीदवार को अचानक नामांकन वापस लेना पड़ा. इस परिदृश्य में निर्विरोध चुनाव की संभावनाएं पूरी तरह समाप्त हो गईं. 30 उम्मीदवारों के नामांकन वापस लेने के बावजूद सुनेत्रा पवार के विरोध में 22 उम्मीदवार डटे रह गए हैं.
स्पष्ट है कि कांग्रेस ने नीतिगत रूप से बारामती चुनाव को संघर्षपूर्ण बनाया और पवार परिवार को संदेश दिया. यहां तक कि नाम वापस लेने का कारण फिलहाल राज्य की राजनीतिक संस्कृति और मर्यादा बनाए रखना बताया, लेकिन भविष्य में उम्मीदवार को खड़ा करने की घोषणा की. यही नहीं, उसने वर्तमान चुनाव में भी स्पष्ट समर्थन की बात नहीं की.
साफ है कि राजनीति जिन नैतिकताओं का आधार थी, वो अब बीती बातें हो चली हैं. बीते जनवरी माह में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था. जिसके बाद उनकी पत्नी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. दूसरी ओर उनके बेटे पार्थ पवार को राज्यसभा की सदस्यता प्रदान की गई.
भाजपा ने अजित पवार के निधन के बाद राज्य सरकार और गठबंधन की स्थितियां पूर्ववत् रखीं. जिसके चलते उनकी पत्नी को पद बिना किसी हस्तक्षेप या सलाह के मिला. वहीं दूसरी ओर उनके बेटे को केंद्र की राजनीति में रिक्त हुआ स्थान दिया गया. दरअसल सुनेत्रा पवार बारामती लोकसभा चुनाव में अपनी ननद सुप्रिया सुले से पराजित हुई थीं.
बाद में उन्हें राज्यसभा भेजा गया. इसी प्रकार पार्थ पवार भी एक बार विधानसभा चुनाव हार चुके थे. कुछ हद तक इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने दांव खेलने की कोशिश की. परंतु निर्विरोध या मतदान होता तो भी परिणामों में कोई अधिक अंतर आने की संभावना नहीं थी. बारामती विधानसभा क्षेत्र पवार परिवार का गढ़ माना जाता है.
पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार वहां से लगातार आठ बार जीत दर्ज कर चुके थे. साल 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 24 उम्मीदवारों के सामने चुनाव लड़ते हुए एक लाख 81 हजार से अधिक मतों की भारी बढ़त हासिल की थी, जिसमें उनके भतीजे योगेंद्र पवार भी शामिल थे. यह तथ्यात्मक स्थिति भी चुनाव के संभावित परिणामों को समझने के लिए पर्याप्त है.
दूसरी ओर उपचुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार अचानक ही नहीं उतारा गया. पूर्व विधान परिषद सदस्य विजयराव मोरे के बेटे अधिवक्ता आकाश मोरे को कांग्रेस ने टिकट सोच-समझ कर दिया. उनके नाम की मंजूरी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने दी, जिसकी औपचारिक घोषणा महासचिव केसी वेणुगोपाल ने की.
जातिगत समीकरणों के रूप में उम्मीदवार क्षेत्र के प्रभावशाली धनगर समुदाय को देखते हुए चुना गया. कांग्रेस के कदम को महाविकास आघाड़ी के सदस्यों ने गलत न बताते हुए पार्टी का फैसला बताया. यहां तक कि शरद पवार ने लोकतांत्रिक रुख अपनाते हुए कहा कि किसी भी पार्टी को उम्मीदवार उतारने का पूरा अधिकार है.
कांग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि राजनीति धमकियों से नहीं चलती और हर किसी को चुनाव लड़ने का अधिकार है. हालांकि इससे पहले अजित पवार के बेटे पार्थ पवार ने चेतावनी दी कि कांग्रेस को अपने फैसले की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. यह घटनाक्रम यहीं नहीं रुका.
जब चारों ओर से नाम वापसी की अपील की गई तो कांग्रेस की ओर से कहा गया कि संवेदनशील स्थिति में उसने दो कदम पीछे हटने का निर्णय लिया है, ताकि राज्य की राजनीतिक परंपराओं और आपसी सम्मान को बनाए रखा जा सके. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि पार्टी का यह फैसला किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं है.
दूसरी ओर यह भी कह दिया कि कांग्रेस का यह केवल एक अस्थायी कदम है. पार्टी 2029 के विधानसभा चुनाव में बारामती से मजबूती के साथ वापसी करेगी और अपना उम्मीदवार जरूर उतारेगी. जिससे साफ हुआ कि परंपराओं को तिलांजलि देने की तैयारी थी, लेकिन विपरीत परिस्थिति देख बचने का प्रयास किया गया है.
सवाल यही है कि अजित पवार ने भाजपा गठबंधन को समर्थन मात्र तीन साल पहले देना आरंभ किया था. उससे पहले तीन दशक से अधिक समय तक वह कांग्रेस के साथ ही थे. यदि भाजपा कांग्रेस उम्मीदवार के लिए अपने उम्मीदवार का नाम वापस ले सकती है तो कांग्रेस को किस बात की समस्या थी? निश्चित ही यह समस्या आकलन के बिना कदम उठाने से उत्पन्न हुई.
इसमें कोई दो-राय नहीं रही कि किसी नेता के निधन के बाद होने वाले उपचुनावों में अधिक मुकाबले की संभावना नहीं रहती है. कांग्रेस के बारामती में मुकाबला करने की इच्छा को कहां से जन्म मिला, यह भी सोच और खोज का विषय है. फिलहाल अंत समय में अपने उम्मीदवार का नामांकन वापस लेकर कांग्रेस ने अपनी ताकत का अंदाज लगाने की जगह संभावित बुरी पराजय को टाल दिया है.
साथ ही पवार परिवार के प्रति सहानुभूति को बढ़ाकर खुद के प्रति एक वैमनस्य का भाव उत्पन्न कर दिया है, जो 2029 के चुनावों में ही नहीं, बल्कि आगे भी कई सालों तक बना रहेगा. जिसकी बानगी पार्थ पवार की प्रतिक्रिया में मिल ही गई है.