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अवधेश कुमार का ब्लॉगः भाजपा को करना होगा आत्मनिरीक्षण

By अवधेश कुमार | Updated: December 12, 2018 14:44 IST

विधानसभा चुनाव में मतदान कई कारकों पर निर्भर करता है जिसमें शीर्ष नेता एक कारक हो सकता है, संपूर्ण नहीं. वैसे भी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान - जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच ज्यादातर सीटों पर सीधा मुकाबला था वहां मुख्यमंत्नी पहले से मौजूद थे इसलिए यह केवल एक नेता की लोकप्रियता का सव्रेक्षण नहीं था.

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देश में जैसा राजनीतिक वातावरण निर्मित हो चुका है उसमें हर चुनाव को प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का पैमाना तथा 2019 के लोकसभा चुनाव की दृष्टि से विश्लेषित किया जाता है. ऐसा नहीं हो सकता कि किसी नेता के नेतृत्व में उसकी पार्टी सारे चुनाव जीते, तभी उसे लोकप्रिय माना जाए. 

विधानसभा चुनाव में मतदान कई कारकों पर निर्भर करता है जिसमें शीर्ष नेता एक कारक हो सकता है, संपूर्ण नहीं. वैसे भी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान - जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच ज्यादातर सीटों पर सीधा मुकाबला था वहां मुख्यमंत्नी पहले से मौजूद थे इसलिए यह केवल एक नेता की लोकप्रियता का सव्रेक्षण नहीं था. बावजूद इसके यह भी नहीं माना जा सकता कि इन चुनावों से मोदी सरकार और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए संदेश नहीं है. 

यह कहना आसान है कि जब आप केंद्र और प्रदेश दोनों की सत्ता में हैं तो सत्ता विरोधी रुझान स्वाभाविक होता है. किंतु क्यों होता है? जब आप अच्छा शासन देंगे, जनता के हितों का ध्यान रखेंगे, कानून और व्यवस्था कायम रखेंगे, अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखेंगे तो सत्ता विरोधी रु झान हो ही नहीं सकता. यही बात राजस्थान पर लागू होती है. यह कहकर कि राजस्थान में हर बार सरकारें बदल जाती हैं, इनके कारणों की अनदेखी नहीं की जा सकती.  ऐसा नहीं है कि भाजपा को विरोधी रु झानों और रणनीतियों का आभास बिल्कुल नहीं था. अमित शाह ने महीनों पहले से काम करना आरंभ किया था. सभी राज्यों में सर्वेक्षण कराए गए, विधायकों एवं मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड खंगाला गया. निर्ममता से विधायकों के टिकट भी काटे गए. 

राजस्थान में छह मंत्रियों सहित 56 तो मध्य प्रदेश में पांच मंत्रियों सहित 53 विधायकों की जगह नए उम्मीदवार उतारे गए. इसका  कई जगह स्वागत हुआ तो  भितरघात भी हुआ. राजस्थान में बागियों और भितरघात का असर साफ दिखा है. छत्तीसगढ़ में पिछला चुनाव भाजपा ने केवल 0.75 प्रतिशत के अंतर से जीता था. इतना महीन अंतर कभी भी पाटा जा सकता था. 2003 से 2013 तक हार का अंतर घटता रहा. रमन सिंह इस खतरे को दूर करने में जितना सफल हो सकते थे, नहीं हुए. 

टॅग्स :विधानसभा चुनावभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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