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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: सरकार पर आंदोलन का दबाव और नया कानून

By अभय कुमार दुबे | Updated: December 25, 2019 07:15 IST

2016 में संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जिसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद राजेंद्र अग्रवाल के हाथ में थी) ने नागरिकता संशोधन विधेयक के मसविदे की जांच की थी. इस समिति की रपट संसद की वेबसाइट पर उपलब्ध है. समिति के सामने तथ्य रखे गए कि देश में धार्मिक रूप से सताए गए शरणार्थियों की संख्या कितनी है.

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ठळक मुद्देजानकारी दी गई कि ऐसे शरणार्थी लोगों की संख्या कुल 31,313 है जिनमें 25,447 हिंदुओं की है, 5,806 सिख हैं, 56 ईसाई हैं, दो पारसी हैं और दो बौद्ध हैं. जाहिर है कि संयुक्त संसदीय समिति की रपट का संदेश था कि इतने थोड़े से नागरिकता-अभ्याíथयों के लिए किसी बड़े संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं है.

जुझारू और वास्तविक जनांदोलन अगर राष्ट्रव्यापी हो तो राजनीति पर उसका असर तुरंत दिखाई देने लगता है. जैसे ही नागरिकता के संशोधित कानून (सीएए) और नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजनशिप (एनआरसी) की आग फैली, सबसे पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के घटकों (अकाली दल, जनता दल-यू, लोक जनशक्ति पार्टी) को ही नहीं, खुद भारतीय जनता पार्टी को भी अपने रवैये में संशोधन करने की जरूरत महसूस होने लगी. क्या ही अच्छा होता अगर ये पार्टियां शुरू से ही इस सवाल पर पेशबंदी करके रखतीं. इस संदर्भ में देखना मुनासिब होगा कि वे कौन सी सलाहें थीं, जिनकी जानबूझ कर उपेक्षा करके सरकार ने यह रास्ता अपनाया.

2016 में संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जिसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद राजेंद्र अग्रवाल के हाथ में थी) ने नागरिकता संशोधन विधेयक के मसविदे की जांच की थी. इस समिति की रपट संसद की वेबसाइट पर उपलब्ध है. समिति के सामने तथ्य रखे गए कि देश में धार्मिक रूप से सताए गए शरणार्थियों की संख्या कितनी है.

जानकारी दी गई कि ऐसे लोगों की संख्या कुल 31,313 है जिनमें 25,447 हिंदुओं की है, 5,806 सिख हैं, 56 ईसाई हैं, दो पारसी हैं और दो बौद्ध हैं. जाहिर है कि संयुक्त संसदीय समिति की रपट का संदेश था कि इतने थोड़े से नागरिकता-अभ्याíथयों के लिए किसी बड़े संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं है. इन्हें बिना इसके नागरिकता दी जा सकती है. पहले भी दूसरे देशों से आए हिंदुओं को नागरिकता दी जाती रही है.

इसी तरह जिस समय संसद में संशोधन विधेयक पर बहस हो रही थी, उसी समय एक सांसद ने सुझाव दिया था कि बिल में धर्मो को नाम लेकर गिनाना जरूरी नहीं है. केवल इतना कहना काफी है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए भारत तैयार है, अगर वे धार्मिक उत्पीड़न के शिकार होने के कारण नागरिकता चाहते हैं. स्पष्ट है कि अगर यह सुझाव सरकार मान लेती, तो वह मुसलमान शरणार्थियों को सांप्रदायिक नजरिये से उपेक्षित करने के आरोप से बच जाती, और उसका घोषित मकसद भी पूरा हो जाता.  

लेकिन, सरकार ने न पहली राय मानी, न दूसरी. प्रश्न यह है कि उसने ऐसा क्यों किया? पहली नजर में लगता है कि भाजपा की इस रणनीति के दो मुख्य फोकस हैं. पहला, वह बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी हिंदुओं को असम और उत्तर-पूर्व में बसाना चाहती है, ताकि इस क्षेत्र में आबादीमूलक परिवर्तन करके चुनावी पलड़े को स्थायी रूप से अपने पक्ष में झुकाया जा सके.

इसीलिए असम समझौते के तहत निर्धारित कट-ऑफ डेट 1971 को आगे घसीट कर 2014 कर दिया गया. परिणाम यह निकला कि असम उबल गया, त्रिपुरा अशांत हो गया. दोनों जगह भाजपा की सरकारें हैं, और अब वे अपने ही समर्थन आधार को संतुष्ट करने के लिए जूझ रही हैं. दूसरी राय सरकार ने इसलिए नहीं मानी कि अगर वह धर्मो का नाम न गिनाती तो उसका वह विचारधारात्मक एजेंडा पूरा नहीं होता जो मुसलमानों को राजनीति के बियाबान में धकेलने का इरादा रखता है.

जहां तक राजग के सहयोगी दलों का प्रश्न है- उनकी सांसत भी देखने लायक है. उनके समर्थन से सीएबी संसद में सीएए बना है. वे यह भी जानते हैं कि सीएए और एनआरसी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. यह भी कहा जा सकता है कि ये दोनों शर्ट और पैंट की तरह हैं. एक को पहनना है तो दूसरे को पहनना ही होगा. वर्ना आप ऊपर से या नीचे से नंगे नजर आएंगे.

यही हालत इन दलों की हो गई है. इन्हें अंदाजा नहीं था कि सीएए और एनआरसी को मिला कर पढ़ने से जनता के बीच इतने अंदेशे पैदा होंगे, और संघर्षरत लोगों से सड़कें भर जाएंगी. अब वे पतली गली से निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं, जो उनके लिए उपलब्ध नहीं है.

इस जनांदोलन ने जो राष्ट्रीय बहस चलाई है, उसने सीएए और एनआरसी पर न केवल बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है, बल्कि संसद में होने वाली दलबंदीपरक स्पर्धामूलक चर्चा और बहुमत-अल्पमत के आधार पर बनने वाले कानूनों की लोकतांत्रिक वैधता पर भी प्रश्न खड़ा कर दिया है. इससे पता चलता है कि लोकतंत्र को अगर केवल बहुमत से बने कानूनों के हवाले कर दिया जाएगा, तो उसकी वैधता का क्षय हो जाएगा.

इसके विपरीत यह प्रकरण लोकतंत्र का सहभागी और सहमतिमूलक चरित्र रेखांकित करता है. अगर सरकार ने शुरू से बहुमत की शक्ति पर भरोसा न करके सर्वदलीय बैठक बुलाई होती, सीएए और एनआरसी को विचारधारात्मक आवेग में मिलाने के बजाय अलग-अलग रखा होता, तो वह मौजूदा संकट से बच सकती थी.

कितना भी बड़ा बहुमत क्यों न हो, हर कानून अपने दुरुपयोग के अंदेशों से जन्मना ग्रस्त होता है. इसीलिए उसे बनाने की रफ्तार धीमी होना ही श्रेयस्कर है. आनन-फानन में पारित कानूनों की साख सार्वजनिक जीवन में बहुत जल्दी गिर जाती है, क्योंकि उनका पक्षपाती चरित्र निकल कर लोगों के सामने आ जाता है. 

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