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क्रोएशिया जैसे देश से जीवटता सीखनी चाहिए

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: July 16, 2018 06:40 IST

मध्य और दक्षिण पूर्व यूरोप के बीच में एड्रियाटिक सागर के किनारे बसे छोटे से देश क्रोएशिया ने पूरी दुनिया को चकित कर दिया है। महज 40 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश ने फुटबॉल के धुरंधरों को धूल चटाते हुए विश्वकप के फाइनल में जब अपनी जगह बनाई तो सबका चकित होना स्वाभाविक था। बड़ी बात यह है कि एक देश के रूप में उसे स्थापित हुए केवल 27 साल हुए हैं।

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लेखक- विजय दर्डा

मध्य और दक्षिण पूर्व यूरोप के बीच में एड्रियाटिक सागर के किनारे बसे छोटे से देश क्रोएशिया ने पूरी दुनिया को चकित कर दिया है। महज 40 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश ने फुटबॉल के धुरंधरों को धूल चटाते हुए विश्वकप के फाइनल में जब अपनी जगह बनाई तो सबका चकित होना स्वाभाविक था। बड़ी बात यह है कि एक देश के रूप में उसे स्थापित हुए केवल 27 साल हुए हैं। पहले यह देश यूगोस्लाविया का हिस्सा था और इसका क्षेत्रफल है महज 56 हजार वर्ग किलोमीटर। यानी महाराष्ट्र (क्षेत्रफल 307713 वर्ग किलोमीटर) में साढ़े पांच क्रोएशिया निकल आएंगे। आबादी के लिहाज से देखें तो बस नागपुर और कामठी के बराबर है यह देश। इतने छोटे से देश ने आखिर ऐसा कमाल कैसे कर दिया? कम से कम हम भारतीयों के जेहन में तो यह सवाल उठ ही रहा है क्योंकि हम क्रोएशिया से 312 गुना ज्यादा आबादी वाला देश हैं! 

जिस दिन मास्को में फुटबॉल विश्वकप का शुभारंभ हो रहा था तब मैं संयोग से मास्को में था। अर्जेटीना, ब्राजील, स्पेन, रूस, क्रोएशिया, फ्रांस, इटली, मैक्सिको, सऊदी अरब, सहित दूसरे देशों के हजारों लोग अपने देश का झंडा लेकर जुलूस निकाल रहे थे। सड़कों पर जश्न मना रहे थे। अर्जेटीना से 30 लाख, ब्राजील से 5 लाख तथा अन्य देशों से भी लाखों लोग वहां पहुंचे थे। वे अपने देश की जीत के नारे लगा रहे थे। हिंदुस्तान से भी करीब 30 हजार लोग वहां पहुंचे हुए थे। मैं यह सब देख रहा था। अपने देश का एक झंडा मैं हमेशा अपने पास रखता हूं। मैंने भी झंडा निकाला और सड़क किनारे अपने दोस्त के साथ झंडा फैलाकर खड़ा हो गया। किसी ने मुझसे पूछा कि आपके देश की टीम भी खेल रही है क्या? मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि हमारी टीम नहीं खेल रही है लेकिन मैं यह देखने आया हूं कि यह स्टेडियम हमारे खेलने योग्य है? मैंने जवाब तो दे दिया था लेकिन मेरा मन रो रहा था। काश! हमारी टीम भी वहां होती! 

सच कहें तो उस दिन नहीं लगा था कि रोनाल्डो और मेस्सी जैसों को  धकेलते हुए क्रोएशिया आगे निकल जाएगा! दरअसल क्रोएशिया को खेलों के प्रति यह लगनशीलता  यूगोस्लाविया की शिक्षा व्यवस्था से ही मिली है जिसे उसने और परवान चढ़ाया। वहां के स्कूलों में फुटबॉल की इस कदर ट्रेनिंग होती है कि बच्चे समर्पित हो जाते हैं। वहां की सरकारी नीति न केवल खेल बल्कि देश के समग्र विकास को बढ़ावा देती है। यही कारण है कि क्रोएशिया दुनिया के शीर्ष 20 पर्यटन स्थलों में शामिल है। इसके ठीक विपरीत हमारे देश में खेल के नाम पर नीतियां तो हैं लेकिन उन नीतियों को लेकर नैतिकता का अभाव नजर आता है। ओलंपिक में दुनिया के छोटे-मोटे देश भी हमसे ज्यादा पदक ले जाते हैं। इसका सीधा सा कारण यह है कि हमारी खेल नीति पुख्ता नहीं है। जाने-माने एक्टर आमिर खान ने अपनी फिल्म दंगल में इस समस्या को सटीक तरीके से व्यक्त भी किया है। 

इंदिरा गांधी ने काफी पहले यह महसूस कर लिया था कि देश को यदि खेल में आगे ले जाना है तो एक समग्र नीति बनानी होगी। उन्होंने इस पर काफी काम किया और 1984 में राष्ट्रीय खेल नीति की घोषणा की गई। 1992 में इसे और विस्तृत स्वरूप दिया गया। इस राष्ट्रीय खेल नीति में खास तौर पर चीन के विख्यात नेता माओत्से तुंग का जिक्र किया गया जो हमेशा कहते थे कि सेहत पहले, पढ़ाई बाद में! वैसे आपको बता दूं कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भी सेहत को सबसे ऊपर मानते थे। उन्होंने अपनी शिक्षा को एक साल के लिए विराम दिया था ताकि सेहत को दुरुस्त कर सकें और आजादी की लड़ाई लड़ सकें। इसमें कोई संदेह नहीं कि सेहत का सीधा संबंध खेल से है। पहले माता-पिता इस बात को अच्छी तरह समझते थे इसलिए बच्चों को खासकर शाम के वक्त मोहल्ले के मैदानों में खेलने के लिए भेजा जाता था। अब तो मैदान ही गायब हो गए हैं तो बच्चे खेलने जाएं कहां? अब माता-पिता ने  प्राथमिकताएं बदल दी हैं। खेल की जगह ट्यूशन ने ले ली है। 

दिसंबर 2011 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय खेल नीति के नए स्वरूप को स्वीकार किया जिसमें खेलों को बढ़ावा देने के लिए कॉरपोरेट क्षेत्र को शामिल किए जाने का प्रावधान था। इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्रों तथा गांवों में खेल को बढ़ावा देने की बात भी कही गई लेकिन हकीकत यह है कि इस दिशा में कोई खास कामयाबी अब तक नहीं मिल पाई है। दरअसल हुआ यह है कि खेल राजनीति के चंगुल में फंस कर रह गए हैं। आप किसी भी खेल को देखें तो कोई न कोई बड़ा नेता उसका झंडा उठाकर चल रहा है।  हर एसोसिएशन और फेडरेशन पर नेताओं का कब्जा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि फुटबॉल विश्वकप मास्को में हो रहा था लेकिन विश्व के पावरफुल व्यक्ति पुतिन की एक तस्वीर,  होर्डिग या बैनर तक मास्को की सड़कों पर नहीं था और न ही स्टेडियम में था। उनके लिए खेल महत्वपूर्ण है, नेता नहीं! 

हमारे यहां खेल हाशिए पर चला गया है। इसका नतीजा यह है कि 125 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले हमारे देश में ध्यानचंद की हॉकी अंतिम सांसें गिन रही है। पिछले ओलंपिक में हम केवल नॉकआउट तक ही पहुंच पाए थे जबकि हमारा स्वर्णिम इतिहास रहा है।  

मैंने पार्लियामेंट में भी कई बार खेलों का मुद्दा उठाया और कहा कि कोई भी देश अपनी आर्थिक सफलता, टेक्नोलॉजी या अपने खिलाड़ियों से पहचाना जाता है लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहां खेल का महत्व नहीं है। खेल स्कूल और गांव से शुरू होना चाहिए। मैंने कहा था कि खेल विभाग प्रधानमंत्री के पास होना चाहिए। खेल के विकास के लिए यह बहुत जरूरी है। इस विश्वकप में दुनिया ने देखा कि फ्रांस के प्रेसिडेंट इमानुएल मैक्रोन, बेल्जियम के राजा फिलिप और रानी मथिल्डे अपने खिलाड़ियों की हौसला अफजाई के लिए आए। क्रोएशिया की राष्ट्रपति कोलिंदा ग्रेबर कित्रोविक तो इकोनॉमी क्लास का हवाई सफर करके आईं और ड्रेसिंग रूम में जाकर अपने एक-एक खिलाड़ी से गले मिलीं। क्या हमारे लोग इतनी सहजता से मिलते हैं या मिल सकते हैं? हमें समझना होगा कि खेलों के विकास के लिए ऐसी सहजता जरूरी है। 

मैं पी।वी। नरसिंह राव के साथ चीन गया था। मैंने उनसे आग्रह किया कि हमें चीन के खेल प्राधिकरणों को देखना चाहिए क्योंकि हमने सुना है कि 6 साल की उम्र में बच्चों को भरती कर लिया जाता है। बच्चों की रुचि तथा उनकी शारीरिक योग्यता के आधार पर उन्हें खेल के लिए तैयार किया जाता है। वहीं शिक्षा मिलती है। वहीं ट्रेनिंग होती है। हालांकि किन्हीं कारणों से हम चीन का खेल प्राधिकरण नहीं देख पाए लेकिन मेरे मन में हमेशा यह चाहत रही है कि हमारे देश के बच्चों को खेलों में आगे बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर पुख्ता प्रयास होना चाहिए। मुङो लगता है कि क्रोएशिया जैसे देश से हमें सीखना चाहिए कि सीमित संसाधनों के बीच भी शिखर पर कैसे पहुंचा जा सकता है। जरूरत जीवटता की है, स्पष्ट नीति की है, समर्पण की है और जीत के जज्बे की है। खेल को खिलाड़ियों के हाथ में सौंपिए, सफलता नजर आएगी! जब हमारे युवा इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, प्रबंधन, विज्ञान और कला के क्षेत्र   में पूरी दुनिया में भारत को सरताज बना सकते हैं तो खेल में भी भारत  को सरताज बनाने की क्षमता उनमें है! 

और अंत में।। असम के एक छोटे से गांव की हिमा दास ने भारत का वह सपना पूरा कर दिया जो अब तक अधूरा था। विश्व अंडर-20 एथलेटिक  चैंपियनशिप में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। हिमा अत्यंत मध्यमवर्गीय परिवार से हैं लेकिन अभावों को उन्होंने कभी अपनी सोच पर हावी नहीं होने दिया और यह करिश्मा कर दिखाया। वे इस देश की वास्तविक सितारा हैं और मौजूदा पीढ़ी तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी हैं। बहुत-बहुत  बधाई हिमा!

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