mob lynching increases last two months what have plan to government | मॉब लिंचिंगः इस 'डायन' को सच मानकर निर्दोषों पर टूट पड़ती है भीड़  

आजकल मॉब लिंचिंग शब्द हर किसी की जुबान पर चढ़ चुका है। कोई भी इससे अनभिज्ञ नहीं है। दिन-ब-दिन यह लोकप्रिय हो रहा है और इसे इस मुकाम तक पहुंचाने का काम हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका सोशल मीडिया कर रहा है। इस उपलब्धि को शायद ही हम भूल पाएंगे...ये उपलब्धि निर्दोषों की जान क्षण भर में निगल जा रही है। इसको लेकर रोष तो आता है, लेकिन किसी आमजन के बस की बात नहीं है कि इसे जड़ से खत्म किया जा सके।

सोशल मीडिया के जरिए असमाजिक तत्व वीडियो वायरल कर दे रहे हैं और मासूम लोग उसे सत्य समझकर उसके पीछे दौड़ने लगते हैं। इस साल बच्चा चोरी की अफवाह इसी डायन सोशल मीडिया के जरिए उड़ाई गई। मई से लेकर अबतक 14 लोग मॉब लिंचिंग का शिकार हो चुके हैं। इन लोगों ने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि बिना कुछ किए बीच बाजार में दर्दनाक मौत मिलेगी। अगर कोई कसूर होता तो ये दर्द कम भी हो सकता था, लेकिन बिना किए पीट-पीटकर मौत के घाट उतारा गया है। 

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हम जिन सियासतदानों से उम्मीद कर बैठे रहते हैं कि ये हमारे अंग रक्षक बनेंगे, तो शायद सबसे बड़ी गलती होती है। हमें हमेशा से सिखाया गया है कानून का पालन करना है और यही कानून दोषियों के ऊपर भी लागू होता है, पर जब तक सजा की नौबत आती है तब तक अधिकतर जिंदगी हार चुके होते हैं। खैर, सियासतदानों की रोटिंयां भी ऐसे ही मुद्दों के जरिए आजकल सिकने लगी हैं तो अब इनसे उम्मीद लगाना भी बेइमानी होगी।

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पिछले दो महीनों में पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और ओडिशा में मॉब लिंचिंग की घटनाएं सामने आई हैं। इनमें 14 लोगों की जिंदगियां निगल ली गईं और ताजा मामला महाराष्ट्र का है, जहां धुले जिले में ग्रामीणों ने बच्चा चोरी करने वाले गिरोह का सदस्य होने के शक में रविवार को पांच लोगों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। 

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अब इस घटना के बाद प्रशासन पीटने वाले ग्रामीणों को हिरासत में लेने में जुटा हुआ है, लेकिन एक भी बार नहीं सोचा गया है कि जिस जगह से यह अफवाहें उड़ाई जा रही हैं क्या उसको खत्म करने के लिए कोई कदम उठाया जा रहा है। बेशक, जिन लोगों ने इस तरह की वारदातों को अंजाम दिया है उन्हें सजा मिलनी चाहिए, लेकिन ऐसी वारदातों को रोकने के लिए केवल यह कह देना काफी नहीं कि सोशल मीडिया पर उड़ रही अफवाहों पर ध्यान न दें। इसकी जड़ तक जाने की आवश्यकता है।

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