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ब्लॉग: विद्यार्थियों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: December 7, 2023 11:50 IST

खुदकुशी को रोकने के लिए सरकार से ज्यादा जिम्मेदारी समाज और परिवार की है। लोकसभा में 6 दिसंबर को सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता राज्यमंत्री ए. नारायण स्वामी ने एक सवाल के जवाब में बताया कि 2019 से 2021 के दौरान देश में 35,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली। 

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ठळक मुद्दे2019 में 10335, 2020 में 12526 तथा 2021 में 13089 विद्यार्थियों ने अपनी जान दे दी- आंकड़ेंसरकार ने 2021 के बाद के आंकड़ें नहीं दिएअनुमान है कि 2022 में आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों का आंकड़ा 14,000 के पार हो गया

बुधवार को सरकार ने देश में छात्रों के बीच आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंताजनक जानकारी दी। यह जानकारी बदलते आर्थिक-सामाजिक परिवेश के एक खतरनाक पहलू की ओर संकेत करती है। खुदकुशी को रोकने के लिए सरकार से ज्यादा जिम्मेदारी समाज और परिवार की है। लोकसभा में 6 दिसंबर को सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता राज्यमंत्री ए. नारायण स्वामी ने एक सवाल के जवाब में बताया कि 2019 से 2021 के दौरान देश में 35,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली। 

यह संख्या हर साल बढ़ती जा रही है। मंत्री के मुताबिक, 2019 में 10335, 2020 में 12526 तथा 2021 में 13089 विद्यार्थियों ने अपनी जान दे दी। सरकार ने 2021 के बाद के आंकड़ें नहीं दिए लेकिन, अनुमान है कि 2022 में आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों का आंकड़ा 14,000 के पार हो गया होगा। पिछले 3 दशकों में देश का सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक परिदृश्य तेजी से बदला है। 

सभी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, खासकर शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों में उज्ज्वल भविष्य बनाने की चाह में ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने की होड़-सी लगी है। जब, असफलता हाथ लगती है तो उसके भयावह नतीजे सामने आते हैं। कई छात्र सफलता के लिए दोगुनी मेहनत करने लगते हैं मगर कुछ छात्र असफलता का मानसिक सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाते और आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाते हैं। 

बच्चों का भविष्य संवारने के लिए माता-पिता अपनी ओर से हरसंभव प्रयास करते हैं लेकिन बच्चों की मानसिकता को भांपने में वे विफल रहते हैं या बच्चे की इच्छा के विपरीत वे उस पर किसी विशिष्ट संस्थान में प्रवेश हासिल करने के लिए अच्छे नंबर लाने का दबाव बढ़ाते हैं। देश में कोटा सहित अनेक शहरों में आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल, आईएएस, आईपीएस तथा ऊंचे पद दिलवाने वाले खास व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग सेंटर कुकुरमुत्तों की तरह खुल गए हैं। 

ये संस्थान लाखों की फीस लेते हैं, विद्यार्थियों को विश्वास दिए बिना लगातार पढ़ने को मजबूर करते हैं, ऐसे में विद्यार्थियों पर मानसिक तनाव बहुत बढ़ जाता है। कई विद्यार्थी ऐसे होते हैं, जिनके परिवार भारी कर्ज लेकर उन्हें इन महंगे शिक्षा संस्थानों में भेजते हैं। 

बच्चों के मन में एक चिंता यह भी होती है कि परीक्षा में उत्तीर्ण न होने पर परिवार कर्ज कैसे चुका पाएगा। अपने परिवार की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने से वह हताशा से घिर जाता है। ऐसी स्थिति में उसे परिवार की ओर से भावनात्मक सहारा भी नहीं मिल पाता। अकेलापन उसकी हताशा को और बढ़ा देता है। 

कोटा में विद्यार्थियों के बीच आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। उस पर पिछले महीने सुनवाई करते हुए देश की शीर्ष अदालत ने इसके लिए माता-पिता की बच्चों से जरूरत से ज्यादा अपेक्षा करने की मानसिकता को भी जिम्मेदार ठहराया था। आत्महत्या सिर्फ कोचिंग संस्थानों के बच्चों तक सीमित नहीं है। 

प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक, जूनियर कॉलेज तथा डिग्री कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में भी आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सहपाठियों के साथ ज्यादा नंबर लाने की प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ आर्थिक असफलता का भाव भी विद्यार्थियों में हताशा भर देता है। 

इसके अलावा प्रेम प्रकरण में असफलता, छोटी-छोटी बात पर भावनात्मक रूप से आहत हो जाने, एकल परिवारों में बच्चों के मनोभावों को समझने की इच्छाशक्ति का अभाव, बच्चों को माता-पिता से मिलनेवाले भावनात्मक समर्थन का अभाव भी बच्चों के बीच आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। आत्महत्या के लिए कोई भी व्यक्ति एक दिन में अपना मन नहीं बनाता। 

जब वह किसी समस्या से घिर जाता है, तो उससे बाहर निकलने के लिए हाथ-पैर मारता है, लेकिन जब उसे कहीं से कोई नैतिक या भावनात्मक समर्थन और मार्गदर्शन नहीं मिलता तो हताश हो जाता है तथा वह आत्महत्या की ओर प्रवृत्त हो जाता है। सरकार हर बच्चे की मानसिक स्थिति पर नजर नहीं रख सकती। 

यहां उसकी भूमिका से ज्यादा महत्वपूर्ण समाज एवं परिवार ही है। बच्चे रोजमर्रा की जिंदगी में समाज तथा परिवार की निगरानी में रहते हैं। उनमें यह आत्मविश्वास पैदा करना जरूरी है कि किसी भी कठिनाई या संकट से निपटने में परिवार, उसके आसपास के लोग, मित्र आदि उसकी मदद के लिए खड़े हैं। 

बच्चों को उनकी प्रतिभा और पसंद के हिसाब से खुद को निखारने का मौका दिया जाना चाहिए। नंबर किसी भी विद्यार्थी की प्रतिभा के वास्तविक परिचायक नहीं होते। परिजनों को अपने बच्चों को मानसिक दबाव से दूर रखना होगा। भावनात्मक लगाव और नैतिक समर्थन बच्चों को हताश होकर आत्महत्या से दूर रखने का सबसे कारगर उपाय है।

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