सुनील सोनी
1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की पहली चिंगारी भड़कने से सिर्फ दो हफ्ते पहले बंबई (अब मुंबई) में 23 अप्रैल को जमशेदजी फरामजी मदान का जन्म उस परिवार में हुआ था, जो उस वक्त सात द्वीपों को मिलाकर ‘बॉम्बे’ बनाने में लग रही लागत को कर्ज के रूप में देनेवाले बॉम्बे रिक्लेमेशन बैंक के मालिकान में से एक था. परियोजना में भारी भ्रष्टाचार के चलते बैंक नहीं डूबता, तो भारत में सिनेमा का इतिहास कुछ और होता. परिवार दिवालिया हुआ, तो 10 साल के जमशेद को स्कूल से निकाल दिया गया. देशभर में घूम-घूमकर पारसी नाटक खेलने वाले एल्फिंस्टन ड्रामा क्लब ने उन्हें कुछ काम दे दिया.
थिएटर की बारीकियां सीखने के बाद 1882 में वे कराची पहुंचे और वहां से कलकत्ता (अब कोलकाता) तक ब्रिटिश सेना को शराब समेत तमाम जरूरत की चीजों की आपूर्ति के ठेके लिए. कारोबार इतना बड़ा हो गया कि रंगमंच प्रेम का हिरण कुलांचे भरने लगा. मौजूदा लेनिन सरणी में तब के कोरिनथियन हॉल के बाद थिएटर कंपनी बन चुके कोवरजी नाजिरजी के एल्फिंस्टन ड्रामा क्लब का अधिग्रहण इसी का फल था. पारसी और बांग्ला रंगमंच के मेल से कोरिनथियन थिएटर के कारण कोलकाता सिने सृजन केंद्र बना और बंबई में उनकी दो थिएटर कंपनियों ने समंदर तट के दो महानगरों में वह सांस्कृतिक सेतु रचा,
जिसने अंतत: लाहौर को विस्थापित किया. दुनिया घूम रहे जमशेदजी ने कोलकाता में 1902 में पहला तंबू थिएटर लगाया और 1907 में चौरंगी लेन इलाके में देश का पहला स्थायी सिनेमाघर एल्फिंस्टन (बाद में जिसे चैपलिन सिनेमा भी कहा गया) खोला. यूरोप में फ्रांस के ला सियोते में 1899 में ईडन और अमेरिका के बफेलो में 1896 में एडिसोनिया विस्टास्कोप सिनेमाघर खुलने के एक दशक बाद.
1896 में फ्रांस में स्थापित पैटे फ्रेयर की कंपनी से आयात फिल्म उपकरण से 1914 में मद्रास में भी एल्फिंस्टन खुला. जमशेदजी ने ही बांग्ला की पहली फिल्म ‘बिल्वमंगल’ भी बनाई, जो दादासाहब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ के उनके ही बनाए बांग्ला संस्करण ‘सत्यवान हरिश्चंद्र’ के बाद लगी. भारत में सिनेमाघरों के साथ सिनेक्रांति का यह आगाज वैसे ही था, जैसे अमेरिका में.
1895 से 1915 के बीच पूरे अमेरिका में 10 हजार से अधिक निकलोडियन थिएटर थे, जो किसी दुकान या होटल में 5 सेंट में दो रील की फिल्में दिखाते थे. लेकिन पहला स्थायी सिनेमाघर बनने के बाद जब पूरी लंबाई की फीचर फिल्में बनाने के लिए स्टूडियो की जरूरत पड़ी, तो थॉमस अल्वा एडिसन ने 1908 में न्यूजर्सी में ब्लैक मिरर स्टूडियो खोला.
जल्द ही दूसरे स्टूडियो खुलने लगे, जिनमें वॉर्नर ब्रदर्स, पैरामाउंट, एमजीएम भी थे. हर चीज के लिए एडिसन द्वारा लाइसेंस व पेटेंट शुल्क वसूलने के चलते धीरे-धीरे स्टूडियो कैलिफोर्निया स्थानांतरित होने लगे, जिससे लॉस एंजिल्स के कोने में नींव पड़ी हॉलीवुड की. सारे स्टूडियो; निर्देशकों, अभिनेताओं, लेखकों, तकनीशियनों को तनख्वाह पर रखते थे.
यही नहीं, फिल्म निर्माण, वितरण एवं सिनेमाघर भी उनके ही थे. भारी मुनाफे के बावजूद उन्हें यह बात खाये जा रही थी कि चार्ली चैप्लिन, मैरी पिकफोर्ड, डगलस फेयरबैंक्स जैसे अभिनेता ज्यादा लोकप्रिय हो गए और ज्यादा कमाई भी करने लगे. इधर, समयबद्ध काम, अधिकारों और ज्यादा मेहनताने की मांग भी हो ही रही थी.
यह वही समय था, जब अमेरिका में मजदूर आंदोलन पूरे शबाब पर था. फिल्मों में निवेश और जोखिम बहुत बढ़ चुका था, पर ताकतवर होने के बावजूद स्टूडियो नियंत्रणकारी शक्ति नहीं थे. पैसा, प्रतिष्ठा और सत्ता तीनों दांव पर थे. सितारों समेत पूरे सिनेमातंत्र पर नियंत्रण के लिए अंतत: परेशान स्टूडियो मालिकों ने रास्ता निकाला, जिसने 1929 में ऑस्कर पुरस्कारों को जन्म दिया.
एमजीएम के मालिक लुई बी. मेयर की अगुवाई में स्टूडियो मालिकों ने मिलकर एकेडमी ऑफ मोशन फिल्म आर्ट्स एंड साइंसेज की स्थापना की. अब गोल्डन ग्लोब अवार्ड घोषित हो चुके हैं, तो अमेरिका-यूरोप में फिल्म पुरस्कारों के त्यौहार का मौसम आ चुका है. ‘लोकप्रियता’ पर आधारित गोल्डन ग्लोब से ‘ऑस्कर’ का अंदाजा लगता है,
पर फिल्मों में कला व शिल्प पर जोर के कारण एक्टर्स गिल्ड अवार्ड और बाफ्टा अवार्ड इसे दिशा देते हैं. दुनियाभर के हजारों अभिनेता, निर्देशक, तकनीशियन ‘ऑस्कर’ तय करते हैं, जो इसे वैश्विक मान्यता देते हैं, पर इसके लिए लॉबिंग, प्रचार, अमेरिकी फिल्मजगत की अंदरूनी राजनीति काम करती है. यही कारण है कि प्रतिष्ठा का शिखर होने के बावजूद वह फ्रांस के सीजर या कान के पाम डि’ओर की तरह कला की कसौटी नहीं है.