अंग्रेजों के जाने के बाद भी औपनिवेशिक मानसिकता टिकी रही क्योंकि नौकरशाही को उसका अभ्यास हो चुका था और निहित हित के चलते उसकी श्रेष्ठता की पैरवी भी कई-कई कोनों से होती रही। भाषा को लेकर भेदभाव का विषय उलझता गया और राजनीति के स्वार्थ के बीच भारतीय भाषा ...
मनोविज्ञान के आधुनिक अनुशासन को एकरूपी ढंग से देखने की आदत बन चुकी है जबकि शुरू से ही इसके निर्माण में अच्छी खासी बहुलता है और कई तरह के मनोवैज्ञानिक ज्ञान का सृजन होता आ रहा है। ...
भ्रष्टाचार आज के दौर में घर, परिवार, निजी और सरकारी संस्थाओं में हर कहीं फैलता जा रहा है और इसका परिणाम जन, जीवन और धन की हानि के रूप में दिख भी रहा है. ...
भारत में शिक्षा पाने का अधिकार सरकार ने सबको दे दिया है पर कौन, कितनी और कैसी शिक्षा पाता है, यह उसके भाग्य और औकात पर निर्भर करता है क्योंकि सबको समान शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ...
श्रीकृष्ण जन्म से ले कर जीवनपर्यंत वे इतने रूपों और इतनी भूमिकाओं में आते हैं कि उनकी कोई एक स्थिर पहचान तय करना मुश्किल है. इसमें भगवद्गीता का उपदेश अहम है जिसमें वह जीने की राह बताते हैं. ...
संस्कृति को उन उदात्त जीवन मूल्यों के रूप में भी देखा जाता है जो आदर्श रूप में प्रतिष्ठित होते हैं और समाज की गतिविधि के लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं। बहुआयामी संस्कृति की सत्ता उन अनेकानेक मूर्त और प्रतीकात्मक परंपराओं में रची-पगी विभिन्न रूपों में ...
यह निर्विवाद रूप से स्थापित सत्य है कि आरंभिक शिक्षा यदि मातृभाषा में हो तो बच्चे को ज्ञान प्राप्त करना सुकर हो जाएगा और माता-पिता पर अतिरिक्त भार भी नहीं पड़ेगा. शिक्षा स्वाभाविक रूप से संचालित हो, इसके लिए मातृभाषा में अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए ...
स्वराज पाने के आंदोलन में जिस भारत-भाव का विकास हो रहा था वह विविधताओं के बीच धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा की भिन्नताओं के बीच परस्पर सौहार्द्र और सहनशीलता से श्रेय की प्राप्ति की ओर अग्रसर था. ...