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श्रीलंका: रानिल विक्रमसिंघे ने फिर से प्रधानमंत्री पद की ली शपथ, संभाला कार्यभार

By भाषा | Updated: December 16, 2018 14:12 IST

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री के तौर पर राजपक्षे की नियुक्ति के बाद उन्हें 225 सदस्यीय संसद में बहुमत हासिल करना था लेकिन वह विफल रहे। इसके बाद सिरिसेना ने संसद भंग कर दी और पांच जनवरी को चुनाव कराने की घोषणा की।

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यूनाइटेड नेशनल पार्टी के नेता रानिल विक्रमसिंघे ने रविवार को श्रीलंका के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही देश में 51 दिन लंबा सत्ता संघर्ष खत्म हो गया। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने यहां राष्ट्रपति सचिवालय में एक सादे समारोह में 69 वर्षीय विक्रमसिंघे को पद की शपथ दिलाई। 

सिरिसेना ने विवादास्पद कदम उठाते हुए 26 अक्टूबर को विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया था और उनके स्थान पर महिंदा राजपक्षे को नियुक्त किया था जिससे इस द्वीपीय देश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया था। यूएनपी नेता ने अपनी बर्खास्तगी को गैरकानूनी बताया था।

उनकी यह नियुक्ति तब हुई है जब महिंदा राजपक्षे ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया जिससे विक्रमसिंघे के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। सिरिसेना ने विक्रमसिंघे को हटाकर राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया था। राजपक्षे ने उच्चतम न्यायालय के दो अहम फैसलों के बाद शनिवार को इस्तीफा दे दिया था 

मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार, नया मंत्रिमंडल सोमवार को शपथ लेगा। मंत्रिमंडल में 30 सदस्य होंगे और श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के छह सांसद शामिल होंगे। इससे पहले, विक्रमसिंघे की पार्टी ने कहा कि वह राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के साथ काम करने के लिए तैयार हैं जिन्हें उनकी सरकार के खिलाफ ‘‘कुछ समूहों ने गुमराह’’ किया था।

यूएनपी के उप नेता सजित प्रेमदास ने कहा कि उन्हें इस बात की हैरानी नहीं है कि राष्ट्रपति विक्रमसिंघे को फिर से प्रधानमंत्री बनाने पर राजी हो गए जबकि पहले वह इस बात अड़े थे कि वह उन्हें नियुक्त नहीं करेंगे। कोलंबो गजट ने प्रेमदास के हवाले से कहा, ‘‘यह राष्ट्रपति के असली चरित्र को दिखाता है।’’ 

प्रेमदास ने कहा कि ‘‘यूनिटी सरकार के विरोधी कुछ समूहों ने राष्ट्रपति को गुमराह किया था और इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति ने विक्रमसिंघे को हटा दिया था। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन अब सच सामने आ गया है। पार्टी सरकार में सिरिसेना के साथ दोबारा काम करने के लिए तैयार है।’’ 

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री के तौर पर राजपक्षे की नियुक्ति के बाद उन्हें 225 सदस्यीय संसद में बहुमत हासिल करना था लेकिन वह विफल रहे। इसके बाद सिरिसेना ने संसद भंग कर दी और पांच जनवरी को चुनाव कराने की घोषणा की। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने उनका फैसला पलट दिया और चुनाव की तैयारियों को रोक दिया।

उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को सर्वसम्मति से फैसला दिया कि सिरिसेना द्वारा संसद भंग करना ‘‘गैरकानूनी’’ था। साथ ही न्यायालय ने शुक्रवार को राजपक्षे (73) को प्रधानमंत्री का कार्यभार संभालने से रोकने वाले अदालत के आदेश पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था। ज्यादातर देशों ने राजपक्षे सरकार को मान्यता नहीं दी थी। 

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