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Lohri 2020: लोहड़ी कब है इस बार, कैसे मनाते हैं इसे और क्यों करते हैं इस त्योहार में दुल्ला भट्टी को याद

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 7, 2020 11:34 IST

Lohri 2020 Date: लोहड़ी मुख्य तौर पर सिख धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाता है। इस जुड़ाव कृषि से भी है। इसलिए ये किसानों का भी मुख्य त्योहार है।

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ठळक मुद्देLohri 2020: पंजाब और हरियाण में दिखती है लोहड़ी की धूमलोहड़ी वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक, 13 जनवरी को है लोहड़ी का त्योहार

Lohri 2020: उत्तर भारत और खासकर हरियाणा, पंजाब और राजधानी दिल्ली के क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाने वाला लोहड़ी का त्योहर आम तौर पर मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रांति भी 14 जनवरी को पड़ता है इसलिए लोहड़ी को 13 जनवरी को मनाने की परंपरा है। हालांकि, इस बार मकर संक्रांति पूरे देश में 14 की बजाय 15 तारीख को मनाया जा रहा है। 

पंचांग के अनुसार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 15 जनवरी को तड़के 2.23 बजे हो रहा है। इसलिए मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाया जाएगा। ऐसे में कई जगहों पर लोहड़ी का त्योहार 13 जनवरी को तो कई जगहों पर 14 जनवरी को भी मनाया जा रहा है।

Lohri 2020: लोहड़ी का क्या है महत्व और कैसे मनाया जाता है ये त्योहार

लोहड़ी मुख्य तौर पर सिख धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाता है। इस जुड़ाव कृषि से भी है। इसलिए ये किसानों का भी मुख्य त्योहार है। पंजाब और हरियाणा में इसे काफी धूमधाम से मनाया जाता है। ये वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है। इसलिए इस दिन आग में रवि के फसलों को अर्पित करते हैं और अच्छी नई फसल की कामना की जाती है। किसान इस दिन ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी आने वाली फसल और अच्छी हो।

Lohri 2020: लोहड़ी में दुल्ला भट्टी को याद करने की है परंपरा

इस त्योहार को मुख्य तौर पर शा को मनाया जाता है। शाम को लोग अपने घरों के पास खुली जगह पर आग जलाते हैं। अग्नि में मूंगफली, गजक, तिल, मक्का आदि डालकर इसकी परिक्रमा की जाती है और लोकगीत गाया जाता है। नवविवाहितों के लिए ये त्योहार सबसे खास माना जाता है। नये जोड़े इस दिन अपने अच्छे भविष्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं। 

इस दिन दुल्ला भट्टी को भी याद करने की परंपरा है जिन्हें पंजाब के नायक के तौर पर देखा जाता है। दुल्ला भट्टी मुगल शासन के समय के एक वीर थे जिन्होंने पंजाब की लड़कियों की रक्षा की थी। लोहड़ी में जलते अलाव के साथ-साथ लोकगीतों में दुल्ला भट्टी की कहानी को याद किया जाता है।

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