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Ashta Lakshmi Stotram: घर की दरिद्रता होगी दूर, कुबेर करेंगे धन की वर्षा, करें हर शुक्रवार को अमोघ अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ

By आशीष कुमार पाण्डेय | Updated: March 22, 2024 06:42 IST

वेदों के प्राचीन एवं पवित्र ग्रंथों में मां लक्ष्मी की दिव्य प्रशंसा इस रूप में की गई है कि मां अपने भक्तों के जीवन में धन, ज्ञान, साहस और शक्ति का संचार करते हुए सफलता, खुशहाली और शांति प्रदान करने वाली हैं।

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ठळक मुद्देमां लक्ष्मी अपने भक्तों के जीवन में धन, ज्ञान, साहस और शक्ति देने वाली हैंमाता लक्ष्मी की पूजा से भक्तों को सफलता, खुशहाली और शांति मिलती हैहर शुक्रवार को अष्टलक्ष्मी स्त्रोत का पाठ करने से भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है

Ashta Lakshmi Stotram: वेदों के प्राचीन एवं पवित्र ग्रंथों में मां लक्ष्मी की दिव्य प्रशंसा इस रूप में की गई है कि मां अपने भक्तों के जीवन में धन, ज्ञान, साहस और शक्ति का संचार करते हुए सफलता, खुशहाली और शांति प्रदान करने वाली हैं। इसलिए मान्यता है कि माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये भक्तों को उनके अष्टरुपों का नियमित पूजा करनी चाहिए। अष्टलक्ष्मी स्त्रोत विशेषता यही है की इसका पाठ करने से भक्तों को धन और सुख-समृ्द्धि दोनों मिलते हैं।

सनातन हिंदू धर्म के अनुसार घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह विशेष रुप से शुभ माना जाता है। यदि भक्त माता लक्ष्मी के अष्टस्त्रोत के साथ श्री यंत्र को स्थापित करके उसकी नियमित पूजा करे तो उसे सुख और शांति के साथ धन की प्राप्ति होती है।

मान्यता है कि अष्टलक्ष्मी स्त्रोत का पाठ मुख्यरूप से व्यापारिक क्षेत्रों में वृद्धि करने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। अष्टलक्ष्मी स्त्रोत और श्री यंत्र कि पूजा व्यापार लाभ के लिए विशेष रूप से फायदेमंद होती है। लक्ष्मी जी की पूजा में विशेष रुप से श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ कहा गया है।

मां लक्ष्मी पूजा में श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करने से शीघ्र प्रसन्न होती है। इसके साथ अष्टलक्ष्मी की पूजा करते समय शास्त्रों में कहे गये सभी नियमों का पालन करना चाहिए और पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए। अगर हो सके तो हर शुक्रवार को अष्टलक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए।

अष्टलक्ष्मी पाठ का प्रारम्भ करते समय इसकी संख्या का संकल्प अवश्य लेना चाहिए और संख्या पूरी होने पर उद्धापन अवश्य करना चाहिए। इसके लिए प्रात: जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए। जिस घर में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता है, उस घर में लक्ष्मी निवास नहीं करती है। लक्ष्मी पूजा में दक्षिणा के रुप में सिक्कों का प्रयोग करना चाहिए।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्

आद्य लक्ष्मीसुमनस वन्दित सुन्दरि माधवि, चन्द्र सहोदरि हेममये,मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायिनि, मंजुल भाषिणी वेदनुते।पंकजवासिनी देव सुपूजित, सद्गुण वर्षिणी शान्तियुते,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, आद्य लक्ष्मी परिपालय माम् ।। 1 ।।

धनलक्ष्मीधिमिधिमि धिन्दिमि धिन्दिमि, दिन्धिमि दुन्धुभि नाद सुपूर्णमये,घुमघुम घुंघुम घुंघुंम घुंघुंम, शंख निनाद सुवाद्यनुते।वेद पुराणेतिहास सुपूजित, वैदिक मार्ग प्रदर्शयुते,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, धनलक्ष्मी रूपेणा पालय माम् ।। 2 ।।

विद्यालक्ष्मी प्रणत सुरेश्वर भारति भार्गवि, शोकविनाशिनि रत्नमये,मणिमय भूषित कर्णविभूषण, शान्ति समावृत हास्यमुखे।नवनिधि दायिनि कलिमलहारिणि, कामित फलप्रद हस्तयुते,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, विद्यालक्ष्मी सदा पालय माम् ।। 3 ।।

धान्यलक्ष्मीअयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनी, वैदिक रूपिणि वेदमये,क्षीर समुद्भव मंगल रूपणि, मन्त्र निवासिनी मन्त्रयुते।मंगलदायिनि अम्बुजवासिनि, देवगणाश्रित पादयुते,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, धान्यलक्ष्मी परिपालय माम् ।। 4 ।।

धैर्यलक्ष्मीजयवरवर्षिणी वैष्णवी भार्गवि, मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये,सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद, ज्ञान विकासिनी शास्त्रनुते।भवभयहारिणी पापविमोचिनी, साधु जनाश्रित पादयुते,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, धैर्यलक्ष्मी परिपालय माम् ।। 5 ।।

संतानलक्ष्मीअयि खगवाहिनि मोहिनी चक्रिणि, राग विवर्धिनि ज्ञानमये,गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि, सप्तस्वर भूषित गाननुते।सकल सुरासुर देवमुनीश्वर, मानव वन्दित पादयुते,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, सन्तानलक्ष्मी परिपालय माम् ।। 6 ।।

विजयलक्ष्मीजय कमलासिनि सद्गति दायिनि, ज्ञान विकासिनी ज्ञानमये,अनुदिनमर्चित कुन्कुम धूसर, भूषित वसित वाद्यनुते।कनकधरास्तुति वैभव वन्दित, शंकरदेशिक मान्यपदे,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, विजयलक्ष्मी परिपालय माम् ।। 7 ।।

गजलक्ष्मी/राज लक्ष्मीजय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि, सर्वफलप्रद शास्त्रमये,रथगज तुरगपदाति समावृत, परिजन मण्डित लोकनुते।हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित, ताप निवारिणी पादयुते,जय जय हे मधुसूदन कामिनी, गजरूपेणलक्ष्मी परिपालय माम् ।। 8 ।।

फ़लशृति-

श्लोक || अष्टलक्ष्मी नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि |विष्णुवक्षःस्थलारूढे भक्तमोक्षप्रदायिनी ||

श्लोक || शङ्ख चक्र गदाहस्ते विश्वरूपिणिते जयः |जगन्मात्रे च मोहिन्यै मङ्गलम शुभ मङ्गलम ||

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