लखनऊः उत्तर प्रदेश में बंदरों की बढ़ती आबादी के चलते यूपी के कई शहरों में लोगों को बंदरों के उत्पाद का सामना करना पड़ रहा है. चित्रकूट और मथुरा जैसे धार्मिक शहरों में आए श्रद्धालुओं के हाथों से बंदर प्रसाद ही नहीं चेहरे पहले गए चश्मे तक को झपटा मार कर छीन ले जाते हैं. इस कारण से शहर में जगह-जगह पर श्रद्धालुओं को चश्मा जेब में रखने की सलाह देने वाले पोस्टर लगाए गए हैं. जबकि राज्य के अन्य शहरों में बंदर घर में रखे खाने के समान को घुस उठा ले जा रहे हैं. बंदरों द्वारा किए जा रहे ऐसे उत्पात से जूझ रहे लोगों की इस समस्या का निदान करने के लिए प्रदेश की सरकार ने बंदरों को पकड़ने और उनके प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी वन विभाग को सौंपने का फैसला किया है. इस संबंध में जो आदेश जारी किया गया है,
उसमें लिखा गया है कि वन विभाग को बंदरों को पकड़ने और उनके प्रबंधन को लेकर एक माह में कार्ययोजना बनाएगा और वन विभाग को बंदर पकड़ने में नगर निगम सहयोग करेंगे. सरकार के इस फैसले से बंदरों के उत्पात से त्रस्त शहरों के लोगों को राहत मिलने की उम्मीद जाग गई है.
हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला, तब सरकार ने लिए फैसला
बंदरों को लेकर योगी सरकार ने यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ में दिए गए आश्वासन को लेकर किया है. हाईकोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता विनीत शर्मा और प्राजक्ता सिंघल ने प्रदेश में बढ़ते मानव-बंदर संघर्ष को लेकर एक पीआईएल दाखिल की थी.
इसमें कहा गया था, यूपी के लखनऊ, मथुरा, प्रयागराज, अयोध्या, मथुरा, चित्रकूट, बरेली जैस तमाम शहरों में बंदर के सड़क पर चलते लोगों पर अचानक हमले करने, घरों की छतों और बालकनियों से सामान उठा ले जाने, स्कूलों, अस्पतालों और भीड़ भरे बाजार आदि में उत्पात करने, खेतों और बागानों में फसल नुकसान पहुंचाने से रोकने की व्यवस्था की जाए.
इस याचिका की सुनवाई के दौरान ही प्रदेश सरकार ने गत 13 जनवरी को यह आश्वासन दिया था कि एक महीने के भीतर बंदरों की समस्या से निपटने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार की जाएगी. इसी क्रम अब मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में यह तय हुआ कि बंदरों को पकड़ने में नगर निगम सक्षम साबित नहीं हो रहा है, इसलिए बंदर पकड़ने और उनके प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी वन विभाग को सौंप दी गई है. इस फैसले को लेने के पक्ष में यह कारण बताया गया है कि बंदर वन्यजीव की श्रेणी में आते हैं और उनके व्यवहार, प्रबंधन व पुनर्वास से जुड़ी विशेषज्ञता वन विभाग के पास उपलब्ध है.
जबकि नगर निगम की जिम्मेदारी उन पशु-पक्षियों तक सीमित है, जिनसे गंदगी या सार्वजनिक असुविधा उत्पन्न होती है. जैसे छुट्टा पशु, लावारिस कुत्ते या कीड़े-मकोड़े. बंदर वन्यजीव हैं, जिनकी प्रवृत्ति पालतू पशुओं जैसी नहीं होती. उनकी विभिन्न प्रजातियां होती हैं और उनके प्रबंधन, पकड़ने तथा पुनर्वास के लिए विशेष प्रशिक्षण व विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है,
जो नगर निगम के पास नहीं है. यह विशेषज्ञता वन विभाग के पास उपलब्ध होने के कारण बंदरों को पकड़ने की जिम्मेदारी वन विभाग को सौंपना ठीक रहेगा. नगर निगम इस ज़िम्मेदारी को ठीक से निभा में सक्षम नहीं है. नगर निगम इस मामले में वन विभाग को सहयोग करेगा.
लोगों को उम्मीद बदरों के उत्पात पर लगेगा अंकुश
यूपी में बंदरों को पकड़ने को लेकर दो साल पहले तह वन विभाग ही यह जिम्मेदारी निभा रहा था, लेकिन वर्ष 2023 में बंदर को केंद्रीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची से हटा दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि वन विभाग ने यह कहना शुरू कर दिया कि वे अब बंदर प्रबंधन से जुड़े किसी भी निर्देश को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं.
इसके बाद से ही बंदरों को पकड़ें का कार्य करीब-करीब ठप्प हो गया. यही नहीं बंदर पकड़ने को लेकर नगर निगम और वन विभाग के बीच करीब असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई. दोनों विभाग बंदर पकड़ने की जिम्मेदारी लेने से बचते रहे, जिससे आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा.
राज्य में बंदरों के काटने के मामलों में इजाफा हुआ. बीते साल प्रदेश प्रदेशभर बंदरों के हमले के 1,08,00 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं. बताया जा रहा है कि पिछले पांच वर्षों में 55 हजार से अधिक लोग बंदरों के हमलों का शिकार हो चुके हैं. सरकार के इस फैसले से अब राज्य में बंदरों के उत्पात से लोगों को राहत मिलेगी, ऐसी उम्मीद लोगों को हुई है.