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क्षेत्रीय पार्टियों के लिए गंभीर संक्रमण काल

By राजेश बादल | Updated: May 7, 2026 07:45 IST

इन क्षेत्रीय पार्टियों ने आंतरिक लोकतंत्र पनपने ही नहीं दिया. वहां वंशवाद की बेल फलती-फूलती रही. उनके नेता कांग्रेस पर आरोप लगाते रहे

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भारतीय लोकतंत्र इन दिनों संक्रमण काल से गुजर रहा है. इस कालखंड में अनेक विकराल चुनौतियां हैं और पूंजीगत महामारियां भी. निश्चित रूप से आजादी के बाद हिंदुस्तान ने जिस सामुदायिक नेतृत्व वाली जम्हूरियत को स्वीकार किया था उसमें प्रत्येक व्यक्ति और पार्टी को उभरने का अवसर दिया गया था. यह एक ऐसी पवित्र भावना थी जो दुनिया के नक्शे पर उभरे एक स्वतंत्र देश के पुनर्निर्माण अनुष्ठान में हर नागरिक को आहुति देने का मौका देना चाहती थी. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ.

जैसे-जैसे संसार में लोकतंत्र के नए अत्याधुनिक संस्करण आते गए, उनमें धनबल, बाहुबल, सैनिक ताकत और तीव्र महत्वाकांक्षा की बुराइयां दाखिल होती गईं. भारत पर भी उसका असर पड़ा. धीरे-धीरे यह जहर देश की देह में इतना फैला कि सभ्य लोकतंत्र की मूल मंशा खो गई. आज इस शासन प्रणाली का जो स्वरूप हम देख रहे हैं, वह स्वस्थ नहीं  है. यह अब केवल मतदान के जरिये सत्ता में आने की चाबी बनकर रह गया है.  

हाल ही में संपन्न कुछ विधानसभाओं के चुनाव परिणामों का हम गहराई से विश्लेषण करें तो पाते हैं कि सबसे ज्यादा झटका क्षेत्रीय पार्टियों को लगा है. बंगाल हो अथवा तमिलनाडु, केरल हो या असम- इन सभी में भारतीय जनता पार्टी की आंधी में प्रादेशिक पार्टियों ने दम तोड़ दिया. अपवाद के तौर पर हम तमिलनाडु को मान सकते हैं. वहां टीवीके (तमिलगा वेत्री कषगम) की जीत को आप आम आदमी पार्टी की तरह एक नए क्षेत्रीय दल का धूमकेतु की तरह उदय मान सकते हैं.

लेकिन तमिलनाडु में अभिनय के सहारे जनमानस में छवि अंकित करना और फिर सियासत करना परंपरा बन चुका है. चुनाव के समय मुफ्त उपहारों की झड़ी लगा देना दक्षिण भारत के इस हिस्से में अब तंत्र का हिस्सा बन चुका है. टीवीके ने महिलाओं को एक लाख रुपए देने और बेटी के ब्याह के लिए आठ ग्राम सोना देने का वादा किया था. यह अब तक का सबसे बड़ा लालच था. इससे पहले टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन जैसे महंगे घरेलू उपकरण ही बंटते थे. चुनावी मर्यादा का यह स्पष्ट उल्लंघन है और घोर अलोकतांत्रिक है.

मतदाताओं को लालच देकर खरीदने का स्पष्ट उदाहरण है. एक नवोदित क्षेत्रीय पार्टी यकीनन दूसरी क्षेत्रीय पार्टी का विकल्प बन सकती है, लेकिन वह अभी तक किसी राष्ट्रीय दल का पर्याय नहीं बन सकी है. टीवीके शायद डीएमके या एआईडीएमके का विकल्प बन जाए, पर कांग्रेस अथवा भारतीय जनता पार्टी का स्थान लेना उसके लिए आसान नहीं है. भारतीय इतिहास में तो अभी तक ऐसा नहीं हुआ है. कुछ दलों को मिलाकर बनी जनता पार्टी और बाद में जनता दल को एक अवसर मिला था, लेकिन वे जल्द ही बिखर गईं.

इस कड़ी में आम आदमी पार्टी दिल्ली की क्षेत्रीय पार्टी के रूप में तो उभरी मगर उसने राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार नहीं किया. यही बात राष्ट्रवादी कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, बीजेडी, अकाली दल, हरियाणा के दल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार, उत्तरपूर्व के प्रादेशिक दल और वाम दलों पर भी लागू होती है. भारतीय संविधान उन्हें ऐसा करने से रोकता नहीं है.

दरअसल प्रादेशिक पार्टियों ने अपने स्वरूप को राष्ट्रीय स्तर पर विराट रूप देने का प्रयास भी नहीं किया और न ही वे ऐसा करना चाहती थीं. उनका कोई वैचारिक आधार भी नहीं रहा. वे अलग-अलग कालखंडों में तात्कालिक सियासी परिस्थितियों में उत्पन्न हुई थीं. न तो उनके सैद्धांतिक और राष्ट्रीय सरोकार थे और न उनके पास इतने ज्ञानवान राजनेता थे कि वे अखिल भारतीय या अंतरराष्ट्रीय प्रसंगों को समझते और अपनी पार्टियों को समृद्ध करते.

वे अपनी मूल पार्टियां छोड़कर तो आए मगर उन्होंने जो पार्टियां बनाईं, वे कतई लोकतांत्रिक नहीं थीं. ये नई-नई पार्टियां अपने शिखर नेता के पीछे भीड़ की शक्ल में चलती रहीं और उन्हें राजा या रानी जैसा मानती रहीं. उनमें सामुदायिक नेतृत्व कभी नहीं पनप सका. चाहे वह एमजीआर या करुणानिधि के दल हों या फिर एनसीपी, टीएमसी, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी. इन क्षेत्रीय पार्टियों ने आंतरिक लोकतंत्र पनपने ही नहीं दिया. वहां वंशवाद की बेल फलती-फूलती रही. उनके नेता कांग्रेस पर आरोप लगाते रहे. पर उन्होंने नहीं देखा कि राजीव गांधी के बाद जो नेतृत्व आया, वह नरसिंह राव और डॉक्टर मनमोहन सिंह के रूप में आया. यह देश उनकी अगुआई में हुए कार्यों का साक्षी है. भारतीय जनता पार्टी में शिखर स्तर पर परिवारवाद नहीं रहा, अलबत्ता क्षेत्रीय स्तर पर अन्य दलों की तरह कुछ कुनबे सामंती शैली में उभरते रहे.

प्रादेशिक दलों के लिए यह अत्यंत गंभीर समय है. अब उन्हें अपने सांगठनिक ढांचे की नए सिरे से रचना करनी होगी. उन्हें यह भी समझना होगा कि आज का हिंदुस्तान पचास साल पुराना देश नहीं है, जिसमें कार्यकर्ता सिर्फ दरी बिछाने और जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने का काम करते थे. आज वैश्विक स्तर पर संचार साधनों के नित-नए अवतार आ रहे हैं. इसलिए आज के कार्यकर्ता का केवल भीड़ की तरह उपयोग नहीं किया जा सकता. वह अपनी भूमिका की सार्थकता चाहता है. यह तभी संभव है जब क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपना विस्तार करें, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर गंभीर वैचारिक बहस छेड़ें, भारतीय लोकतंत्र में अपनी पुनर्प्रतिष्ठा करें. लेकिन ऐसा होना कोई आसान काम नहीं है.

संभव है कि कुछ समय बाद इन पार्टियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए. एक विराट लोकतंत्र में अगर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव मैदान में रह जाएं तो उसमें भी कोई अनुचित बात नहीं है. संविधान ने गुजिश्ता पचहत्तर साल यदि प्रादेशिक दलों को दिए और वे लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना योगदान नहीं दे सके तो इस बात की भी क्या गारंटी है कि आने वाले पचहत्तर साल में वे अपने आपको बदलकर दिखाएंगे.        

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