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कश्मीर के हाउसबोट में खामोशी, झीलों को छोड़कर गुलमर्ग और पहलगाम को पसंद कर रहे हैं टूरिस्ट

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: January 4, 2026 16:56 IST

हाउसबोट मालिकों ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस सर्दी में उनकी आक्यूपेंसी घटकर 10-15 परसेंट रह गई है, जिससे ज्‍यादातर कमरे खाली हैं, हीटर बंद हैं और रोजी-रोटी छिन गई है।

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जम्‍मू: कभी कश्मीर के टूरिज्म की शान और इसके आकर्षण की तैरती हुई निशानी, श्रीनगर की हाउसबोट, जिन्हें अक्सर “मुकुट का हीरा” कहा जाता था, अब धीरे-धीरे नजरअंदाज़ हो रही हैं क्योंकि टूरिस्ट झीलों को नजरअंदाज कर रहे हैं। हाउसबोट मालिकों ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस सर्दी में उनकी आक्यूपेंसी घटकर 10-15 परसेंट रह गई है, जिससे ज्‍यादातर कमरे खाली हैं, हीटर बंद हैं और रोजी-रोटी छिन गई है। हम टेलीविजन पर गुलमर्ग और पहलगाम में भीड़ देख रहे हैं। लेकिन यहां, हमारी नावें खाली हैं। डल झील के एक हाउसबोट मालिक गुलाम नबी ने बताया कि ऐसा लगता है जैसे टूरिस्ट भूल गए हैं कि श्रीनगर है।

खास बात यह है कि गुलमर्ग और पहलगाम में टूरिस्ट सीजन के दौरान होटल फुल रहते हैं, लेकिन डल और निगीन झीलें कुछ और ही कहानी कहती हैं। कभी कपल्स, फिल्ममेकर्स और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के दूसरे लोगों के बीच पापुलर रहे फ्लोटिंग होटलों का चार्म बदलते ट्रैवल ट्रेंड्स और सर्दियों की ठंड के बीच फीका पड़ गया है।

एक अन्‍य हाउसबोट मालिक का कहना था कि टूरिस्ट बर्फ से ढके रिसार्ट्स को पसंद कर रहे हैं, जो डल झील के खाली होने का एक कारण हो सकता है। हाउसबोट मालिक मंजूर अहमद के बकौल, जो दशकों से इस बिजनेस में हैं, सर्दियों में हाउसबोट चलाना महंगा होता है, जिसमें हीटिंग, जमे हुए पानी के पाइप और मेंटेनेंस पर ज्‍यादा खर्च होता है। वे कहते थे कि जब गेस्ट नहीं आते हैं, तो यह दोहरा नुकसान होता है।

गौरतलब है कि श्रीनगर के हाउसबोट लंबे समय से कश्मीर के टूरिज्म का चेहरा रहे हैं, जो विजिटर्स को शांत डल और निगीन झीलों पर रहने का एक अनोखा अनुभव देते हैं। कभी इनकी संख्या 3,000 से ज्‍यादा थी, लेकिन आज सिर्फ 750 ही चालू हैं। इसकी वजह दशकों से मरम्मत पर लगी रोक, पानी की क्वालिटी में गिरावट और टूरिस्ट की बदलती पसंद है।

टॅग्स :Srinagarjammu kashmirपर्यटनTourism
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