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बिहार विधान परिषदः पूर्णकालिक सभापति नहीं, सीएम नीतीश कार्यकारी व्यवस्था पर करते हैं ज्यादा भरोसा, कई साल से नियुक्ति ही नहीं

By एस पी सिन्हा | Updated: March 5, 2022 16:42 IST

Bihar Legislative Council:  नीतीश सरकार के करीब 16 सालों के कार्यकाल में करीब आधे से ज्यादा वक्त तक  विधान परिषद का संचालन कार्यकारी सभापति की सहारे चलती आ रही है.

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ठळक मुद्देदो बार ही नीतीश सरकार ने विधान परिषद को पूर्णकालिक सभापति दे पाई है.अवधेश नारायण सिंह को करीब पांच साल के लिए सभापति चुना गया था.प्रो. जाबिर हुसैन विधान परिषद के पूर्णकालिक सभापति के तौर पर कार्यरत थे.

पटनाः बिहार में द्विसदनीय व्यवस्था है. इसमें विधान परिषद को उच्च सदन के तौर पर मान्यता प्राप्त है तो दूसरी ओर सीधे जनता के द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि विधानसभा के माध्यम से जनता की समस्याओं पर गौर फरमाते हैं. नीतीश कुमार विधान परिषद के सदस्य रहते हुए राज्य के मुख्यमंत्री हैं.

नियमानुसार किसी भी सदन का सदस्य रहते हुए मंत्री अथवा मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. लेकिन विधान परिषद को सरकार मनमाने ढंग से संचालित करवाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाती है. इसका कारण यह है कि नीतीश सरकार के करीब 16 सालों के कार्यकाल में करीब आधे से ज्यादा वक्त तक  विधान परिषद का संचालन कार्यकारी सभापति की सहारे चलती आ रही है.

 

बिहार विधान सदस्य रहते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कार्यकारी व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा करते हैं. शायद यही कारण है कि विधान परिषद में पूर्णकालिक सभापति की नियुक्ति को गंभीरता से नहीं लिया जाता है. राज्य में सत्ता की बागडोर संभालने के बाद से अबतक केवल दो बार ही नीतीश सरकार ने विधान परिषद को पूर्णकालिक सभापति दे पाई है.

इसमें पंडित ताराकांत झा को तीन साल के लिए और अवधेश नारायण सिंह को करीब पांच साल के लिए सभापति चुना गया था. इन्हें नीतीश सरकार में पूर्णकालीक सभापति के तौर पर कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. सूबे में नीतीश सरकार बनने से पहले प्रो. जाबिर हुसैन विधान परिषद के पूर्णकालिक सभापति के तौर पर कार्यरत थे. उन्हें राबड़ी देवी सरकार ने चुना था.

लेकिन प्रो. हुसैन का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नीतीश सरकार ने प्रो. अरुण कुमार को संविधान की धारा 184(1) के तहत 16 अप्रैल 2006 को कार्यकारी सभापति नियुक्त किया. प्रो. कुमार 4.8.2009 के पूर्वाह्न तक विधान परिषद के सभापति रहे. प्रो. कुमार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पंडित ताराकांत झा को 4.8.2009 अपराह्न से लेकर 6.5.2012 तक पूर्णकालिक सभापति बनने का गौरव प्राप्त हुआ. 

वहीं, पंडित ताराकांत झा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सलीम परवेज को उपसभापति रहते हुए कार्यकारी सभापति की जिम्मेवारी सौंप दी गई. यह व्यवस्था 7.5.2012 से लेकर 8.8.2012 पूर्वाह्न तक चलती रही. परवेज का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नीतीश सरकार ने अवधेश नारायण सिंह को पूर्णकालीक सभापति के पद पर चुना.

सिंह 8.8.2012 से लेकर 8.5.2017 तक पूर्णकालिक सभापति के तौर पर सदन को संचालित करते रहे. लेकिन इनका भी कार्यकाल समाप्त होने के बाद सरकार ने फिर से पुरानी पद्धति अपनाते हुए उपसभापति के तौर पर कार्य कर रहे मो. हारुण रसीद को कार्यकारी व्यवस्था के तहत सभापति की जिम्मेवारी सौंप दिया.

मो. रसीद 9.5.2017 से लेकर 6.5.2020 तक विधान परिषद के कार्यकारी सभापति बने रहे. वहीं मो. रसीद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद 7.5.2020 से लेकर 15.6.2020 तक सभापति का पद रिक्त पड़ा रहा. लेकिन जब सरकार की नजर इस ओर गई तो एकबार फिर से अवधेश नारायण सिंह को कार्यकारी सभापति के तौर पर विधान परिषद की जिम्मेवारी सौंप दी गई, जो अबतक जारी है. 

वहीं, जानकारों का मानना है कि सरकारें ज्यादातर कार्यकारी व्यवस्था इस कारण से भी रखती हैं क्योंकि वे सरकार के मनोकूल कार्य करते रहें. पूर्णकालीक सभापति के चुनाव के बाद संवैधानिक बाध्यत यह होती है कि अगर सभापति महोदय के द्वारा सरकार के मनोकूल कार्य नही कर पाये तो दो-तिहाई अविश्वास के तहत ही उन्हें अपदस्थ किया जा सकता है.

लेकिन कार्यकारी व्यवस्था के तहत जब मन में आया उन्हें पद से हटाया जा सकता है. ऐसे में इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि नीतीश सरकार उच्च सदन के प्रति कितनी गंभीर है. सरकार के द्वारा उच्च सदन के पूर्णकालिक सभापति देने में मनमाना रवैया अपनाये जाने का ऐसा अनूठा उदाहरण शायद ही कहीं दिखती हो. जबकि विधानसभा में हर पांच साल पर अध्यक्ष पद पर चुनाव किया जाना संवैधानिक बाध्यता है.

टॅग्स :बिहारनीतीश कुमारपटना
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