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बिहार के सिल्क सिटी भागलपुर में फीकी पड़ रही है रेशम के धागों की चमक, जूझ रहा है आधुनिक तकनीक और बाजार की चुनौतियों से

By एस पी सिन्हा | Updated: December 20, 2025 17:26 IST

नाथनगर, चंपानगर, बौंसी, पुरैनी जैसे छोटे-छोटे कस्बे व गांवों में करोड़ करोड़ रुपए का माल तैयार होकर भागलपुर और विदेश की मंडियों में निर्यात होता था। एक समय भागलपुर से 400 करोड़ से ज्यादा रुपए का सिल्क, खासकर झुर्रि, तसर, मटका का निर्यात होता था। 

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पटना: बिहार का भागलपुर जिसे “सिल्क सिटी” कहा जाता है, यहां का तसर सिल्क उद्योग, जिसे 'रेशम नगरी' भी कहते हैं। लेकिन इसका व्यापार विगत कई वर्षों से मंदा हो गया है। कभी भागलपुर के सिल्क के कपड़े की दुनिया में डिमांड थी। अभी भी बीस हजार से ज्यादा लूम पर हजारों लोग सिल्क के कपड़े का निर्माण से जुड़े रहे। भागलपुर के आसपास के कई गांवों की आर्थिक खुशहाली सिल्क उद्योग पर आधारित थी। नाथनगर, चंपानगर, बौंसी, पुरैनी जैसे छोटे-छोटे कस्बे व गांवों में करोड़ करोड़ रुपए का माल तैयार होकर भागलपुर और विदेश की मंडियों में निर्यात होता था। एक समय भागलपुर से 400 करोड़ से ज्यादा रुपए का सिल्क, खासकर झुर्रि, तसर, मटका का निर्यात होता था। 

इस काम मे कई औद्योगिक घरानों ने अपनी ऑफिस खोल रखा था। लेकिन आज कच्चे माल, आधुनिक तकनीक और बाजार की चुनौतियों से जूझ रहा है, जिसमें 1990 के दंगों ने बड़ा झटका दिया। हालांकि कई एनजीओ और उद्यमी इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। बवजूद इसके मूलभूत संरचना, हवाई अड्डा के अभाव और सरकारी उदासीनता के कारण 40 वर्ष पहले जापान सरकार के सहयोग से जीरो माइल के बहादुपुर के पास एक स्पिनिंग मिल अब बंद हो चुका है। 

सिल्क धागे का निर्माण कृषि के क्षेत्र में सेरिकल्चर पर आधारित है। बिहार से झारखंड अलग होने के बाद सन 2000 में सिल्क के धागे का उत्पादन करने वाले ककून की खेती का इलाका झारखंड के गोड्डा में चला गया। भागलपुर में सिल्क धागे की कमी से बुनकर पलायन कर गए। उनलोगों ने संसाधन के अभाव में अपना कारोबार कोलकाता, बेंगलुरु, बनारस जैसी जगह पर शिफ्ट कर लिया। भागलपुर आने वाले हर व्यक्ति को यहां के बने सिल्क कपड़े की खरीदी भागलपुर के सौगात के रूप में जरूरी था। हालांकि सिल्क नगरी भागलपुर का तसर सिल्क आज भी अपनी विशिष्ट पहचान और वैश्विक मांग के कारण दुनिया भर में अपनी धाक जमाए हुए है। 

दरअसल, प्राकृतिक सुनहरी चमक, मजबूत व हवादार बनावट, टिकाऊपन और इको-फ्रेंडली उत्पादन के लिए प्रसिद्ध तसर सिल्क भागलपुर का गौरव माना जाता है। तसर सिल्क की इसी प्राकृतिक सुनहरी आभा ने डेनमार्क की एक कंपनी को सिल्क सिटी भागलपुर तक खींच लाया। डेनमार्क की आर्ट काइंड कंपनी का प्रतिनिधिमंडल पहले दिल्ली पहुंचा, जहां उन्हें भागलपुर सिल्क की विशेषताओं की जानकारी मिली। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल नाथनगर पहुंचकर बुनकरों को लूम पर कपड़ा बुनते हुए देखा और सीधे बुनकरों से जुड़कर व्यवसाय करने का निर्णय लिया। इससे भागलपुर को बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिलने की संभावना प्रबल हो गई है। प्रतिनिधिमंडल भागलपुर से सिल्क के छह प्रकार के सैंपल अपने साथ ले गया है। 

साथ ही सैंपल के तौर पर प्रत्येक किस्म में 60-60 मीटर कपड़े का ऑर्डर भी दिया गया है। यदि भविष्य में बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिलता है तो इससे करीब 20 हजार बुनकरों के बंद पड़े हैंडलूम दोबारा चलने लगेंगे और बुनकरों को रोजगार मिलेगा। संघ के संयोजक अलीम अंसारी ने बताया कि फिलहाल सैंपल ऑर्डर दिया गया है, लेकिन आने वाले दिनों में भागलपुरी सिल्क को अच्छी मात्रा में ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में सिल्क वस्त्रों की मांग लगातार बढ़ रही है। प्रधानमंत्री द्वारा स्वदेशी अपनाने के आह्वान के बाद विदेशी बाजारों में भी भारतीय हथकरघा और रेशमी वस्त्रों की अहमियत बढ़ी है। 

जानकारों के अनुसार भागलपुर जिले में 80 हजार से अधिक पावरलूम व हैंडलूम पर करीब लाख बुनकर सिल्क उद्योग से जुड़े हैं। ग्लोबल मार्केटिंग के इस दौर में चीन व अन्य देशों द्वारा सस्ते रेशमी वस्त्र की आपूर्ति किए जाने से भागलपुरी देसी रेशमी कपड़े उनके मुकाबले महंगे पड़ने लगे। इसकी वजह से भी प्रतिद्वंद्विता की दौड़ में यहां का व्यापार प्रभावित हुआ। रेशमी धागा प्राप्त करने वाले कोकून की कमी के कारण यहां के बुनकर चीन और कोरिया के धागे पर निर्भर हो गए। महंगे धागों की खरीदारी कर कपड़ा तैयार करना उनकी मजबूरी हो गई है।

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