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जंग का असली डायरेक्टर तो अमेरिका ही है!

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: June 14, 2025 07:27 IST

इजराइल को यदि अमेरिका जंग रोकने को कहता तो क्या इजराइल बात नहीं मानता?

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अभी ऐसी कोई आशंका नहीं थी कि हमास के साथ जंग में उलझा इजराइल अचानक ईरान पर हमला कर देगा. हमला भी ऐसा कि ईरान के बड़े-बड़े दिग्गज धराशायी हो गए. इजराइली हमले में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के कमांडर-इन-चीफ हुसैन सलामी, ईरान के सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ मोहम्मद बघेरी, खतम-अल अनहिया सेंट्रल हेडक्वॉर्टर्स के कमांडर घोलामली राशिद के अलावा परमाणु वैज्ञानिक और ईरान के एटॉमिक एनर्जी ऑर्गनाइजेशन के पूर्व प्रमुख फेरेदून अब्बासी तथा ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम में शामिल परमाणु वैज्ञानिक मोहम्मद मेहदी तेहरांची मारे गए हैं.

यह भी कहा जा रहा है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के वरिष्ठ सलाहकार अली शमखानी बुरी तरह घायल हो चुके हैं. सवाल यह है कि इजराइल को अभी हमला करने की क्या जरूरत थी? क्या हमले का फैसला इजराइल ने खुद लिया या इसमें पर्दे के पीछे से डायरेक्टर की भूमिका अमेरिका ने निभाई? इसे समझने के लिए कुछ तथ्यों पर गौर करिए.

जानकारी यह आ रही है कि जिन इजराइली विमानों ने ईरान पर हमला किया, उन्होंने कतर स्थित अमेरिकी एयर फोर्स बेस से ईंधन भरवाया. इसके अलावा सऊदी अरब और जॉर्डन ने इजराइली विमानों को अपना एयरस्पेस इस्तेमाल करने दिया. इसका मतलब साफ है कि सऊदी अरब और जॉर्डन पर अमेरिका का दबाव होगा. वैसे भी सऊदी, कतर, बहरीन और यूएई की फिलहाल इतनी हिम्मत नहीं है कि वे अमेरिका के आदेश की अवहेलना कर सकें. इतना ही नहीं ईरान ने जो ड्रोन हमले इजराइल पर करने चाहे वोे भी अमेरिका ने असफल कर दिए.

ईरानी ड्रोन्स को अमेरिका ने मार गिराया. यानी परिदृश्य साफ है कि अमेरिका सीधे जंग में नहीं होते हुए भी जंग का हिस्सा है. इजराइल वही कर रहा है जो अमेरिका कह रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह कहा भी है कि ईरान पर इजराइली हमले की उन्हें जानकारी थी. वे कह रहे हैं कि ईरान को परमाणु संपन्न देश नहीं बनने देना चाहिए. उसे वार्ता की मेज पर लाना है.

उनके वक्तव्य को देखें और इजराइल के हमले के घातक प्रभावों का विश्लेषण करें तो स्पष्ट है कि ट्रम्प किसी भी सूरत में ईरान को बातचीत की मेज पर लाकर परमाणु बम बनाने की उसकी चाहत को रौंदना चाहते हैं. अमेरिकी कोशिश लंबे अरसे से चल रही है. कभी किसी हमले में तो कभी रहस्यमय तरीके से पिछले पंद्रह वर्षों में मसूद अली-मोहम्मदी, माजिद शाहरियारी, दारियुस रेजाईनेजाद, मुस्तफा अहमदी रोशन, मोहसेन फखरीजादेह और अन्य ईरानी परमाणु वैज्ञानिक मारे जा चुके हैं.

ईरान के परमाणु संस्थानों में कई विस्फोट हो चुके हैं. फिर भी ईरान मान नहीं रहा है और बम बनाने के रास्ते पर निरंतर चल रहा है. बुधवार को जो हमला हुआ, वह इसी कड़ी को जोड़ता है. अमेरिका की नीतियों को देखें तो इजराइल उसके लिए ऐसा साथी है जो मध्य पूर्व के देशों में उसकी शक्ति बना हुआ है. ट्रम्प ने चुनाव जीतने से पहले कहा था कि वे जीते तो इजराइल और हमास के बीच की जंग तत्काल समाप्त करवा देंगे. इजराइल को यदि अमेरिका जंग रोकने को कहता तो क्या इजराइल बात नहीं मानता? इसलिए यह मान कर चलना चाहिए कि हमास के खिलाफ इजराइली जंग में अमेरिका पर्दे के पीछे न केवल साथ खड़ा है बल्कि सारी सहायता भी कर रहा है.

भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव में मध्यस्थता का श्रेय तो ट्रम्प ले रहे हैं लेकिन दूसरी ओर जहां उन्हें जरूरत है, वे जंग को हवा भी दे रहे हैं. ईरान पर इजराइल के हमले को यदि भारतीय नजरिये से देखें तो हमारे लिए एक और संकट आ खड़ा हुआ है. सबसे बड़ा सवाल है कि भारत किसके साथ खड़ा होगा?

ईरान से हमारे संबंध हमेशा अच्छे रहे हैं लेकिन इजराइल वह देश है जो हर संकट के समय हमारे साथ अटल खड़ा रहा है. ऑपरेशन सिंंदूर को लेकर इजराइल एकमात्र ऐसा देश है जो खुल कर हमारे साथ आया. हमारे कूटनीतिज्ञ इस बात पर जरूर नजर रख रहे होंगे कि अमेरिकी चाल क्या है और हमें खुद के हितों को किस तरह से सुरक्षित रखना है.

टॅग्स :अमेरिकाUSडोनाल्ड ट्रंप
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