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ब्लॉग : ईरान का एक शासक जिसने दिल्ली में 6 घंटे के भीतर 1 लाख लोगों को मारा

By विकास कुमार | Updated: November 29, 2018 13:46 IST

बात उन दिनों की है जब दिल्ली में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला का शासन था, जिसे बहुत ही अय्याश प्रवृति का माना जाता था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद से मुगल सल्तनत भारत में अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी। उन्ही दिनों ईरान में एक गड़ेरिये का बेटा राजा बन बैठा था।

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हिमालय जिसके सरहदों का निगेहबान और गंगा जिसकी पवित्रता की सौगंध। जिसे लूटने वालों ने बेरहमी से लूटा और संवारने वालों ने बखूबी संवारा। जिसने कभी अपने और पराये की थ्योरी को नहीं अपनाया। आज कहानी उसी हिन्दुस्तान को रक्तरंजित करने वाले एक ऐतिहासिक चरित्र की जिसके देश के लोगों को गुजरात के राजाओं ने अपने यहां शरण दी जिसे आज पारसी समुदाय कहा जाता है। 

बात उन दिनों की है जब दिल्ली में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला का शासन था, जिसे बहुत ही अय्याश प्रवृति का माना जाता था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद से मुगल सल्तनत भारत में अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी। उन्ही दिनों ईरान में एक गड़ेरिये का बेटा राजा बन बैठा था, जिसे इतिहास नादिर शाह के नाम से जानता है। उसको भनक लगी कि भारत दुनिया का सबसे अमीर देश है और जिसे सोने की चिड़िया भी कहा जाता है। उसके बाद नादिर शाह ने अपने सेनापति से कहा,  'सोने की चिड़िया के कुछ पंख मुझे भी चाहिए'।

नादिर शाह दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए निकल चूका था।  मुगल सेनापति जब भी इस बात से मुहम्मद शाह को आगाह करवाते, उसका जवाब होता, 'दिल्ली अभी बहुत दूर है'।  मुगलों की भारी फौज को रौंदते हुए नादिर शाह ने इस लड़ाई को महज छह घंटे में ही जीत लिया और मुहम्मद शाह को नजरबंद कर लिया गया। नादिर शाह पचास लाख रुपये और कुछ घोड़े और हांथियों के साथ रवाना होने के लिए तैयार हो गया था, लेकिन मुगल सेनापति सहादत खान की गद्दारी के कारण पूरा खेल बदल गया। मुगल सल्तनत के दक्कन के सेनापति निजामुल मुल्क और सहादत खान की आपसी प्रतिद्वंद्विता की कीमत दिल्लीवासियों को चुकाना पड़ा।  सहादत खान ने मुगल सल्तनत के खजाने की पूरी जानकारी नादिर शाह को दे दी जिसके कारण नादिर शाह ने पानीपत से दिल्ली जाने का फैसला किया। 

नादिर शाह दिल्ली गया और उसने मुहम्मद शाह रंगीला के सामने 50 करोड़ रुपये की मांग रखी। रंगीला ने रकम की व्यवस्था के लिए नादिर शाह से कुछ दिनों की मोहलत मांगी। इसी बीच दिल्ली में अफवाह उड़ी कि नादिर शाह की मौत हो गई है। नादिर शाह के मौत की खबर से उत्साहित दिल्ली के कुछ लोगों ने उसके कुछ सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। जब इस घटना की जानकारी नादिर शाह को दी गई तो अपने घोड़े पर सवार हो कर वो खुद चांदनी चौक की तरफ निकल पड़ा। रास्ते में ही एक मस्जिद की सीढ़ियों पर चढ़कर उसने अपने मयान से तलवार निकालकर हवा में लहरा दी। इसका मतलब ये था कि जब तक बादशाह अपनी तलवार को वापस मयान में नहीं रख लेता तब तक आप कत्लेआम मचाते रहें। नादिर शाह के आदेश के बाद उसके सिपाही लोगों पर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़े। जो जहां मिला उसे वहीं मार दिया गया। उस वक्त दिल्ली में मौजूद एक डच नागरिक ने इसे अपने डायरी में बयां किया था। 'लोग बदहवास इधर-उधर भाग रहे थे। महिलाओं की आबरू लूटी जा रही थी। कुछ महिलाएं नादिर के सिपाहियों के कहर से बचने के लिए कुओं में कूद रही थीं। बूढ़े और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। दिल्ली के नालों में खून की नदियां बह रही थी'। 

मुहम्मद शाह के बहुत आग्रह के बाद नादिर शाह ने इस कत्लेआम को रोका लेकिन उसने अपने पैसों की मांग को दोगुना करते हुए 100 करोड़ कर दिया। उसकी मांगो को पूरा करने के लिए दिल्ली वालों को एक बार फिर से लूटा गया और इस बार लूटेरे खुद मुगल सैनिक थे। नादिर शाह भारत से इतने पैसे लूट कर ले गया कि उसने अपने देश में तीन सालों तक किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं लिया। 1739 की इस घटना ने दिल्ली को ऐसा जख्म दिया जो वर्षों तक नासूर बना रहा। 

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