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ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने चेतावनियों की अनदेखी की !

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: December 16, 2025 07:22 IST

सिडनी में बोंडी बीच पर एक हमलावर से बंदूक छीनते हुए घायल हो जाने वाले 43 साल के अहमद अल अहमद जैसे लोग समाज की उम्मीद बने हुए हैं.

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ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बोंडी बीच पर यहूदी समुदाय के हनुक्का फेस्टिवल पर हुए हमले को सीधे तौर पर ऑस्ट्रेलिया की सरकार की लापरवाही बताया जा रहा है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है. बीते एक वर्ष में ऑस्ट्रेलिया में 1600 से ज्यादा यहूदी-विरोधी घटनाएं हुईं लेकिन सरकार सतर्क नहीं हुई. ऑस्ट्रेलिया में फैल रही यहूदी विरोधी भावनाओं और विभिन्न घटनाओं को लेकर इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि ऑस्ट्रेलिया की नीति यहूदी-विरोधी आग में घी डालती है, यहूदियों के प्रति नफरत को बढ़ावा देती है. इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हरजोग भी ऑस्ट्रेलिया सरकार से अपील करते रहे कि ऑस्ट्रेलियाई समाज यहूदी-विरोधी भावना की चपेट में है लेकिन वहां की सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया.

सरकार को जब इतनी चेतावनियां मिल चुकी थीं तो हनुक्का फेस्टिवल के दौरान चाक-चौबंद व्यवस्था क्यों नहीं की गई? हमलावर साजिद और नवीद वहां हथियार लेकर पहुंचने में कैसे कामयाब रहे? ऑस्ट्रेलिया यह कह सकता है कि हर जगह पुलिस मौजूद रहे, यह संभव नहीं है लेकिन यह बहाना बकवास ही कहलाएगा. यहूदियों के त्यौहार को लेकर यह आशंका स्वाभाविक तौर पर होनी चाहिए थी कि कहीं आतंकवादी हमला तो नहीं करेंगे? कुछ न कुछ खुफिया जानकारी भी जरूर आई होगी.

इसके बावजूद यदि हमला हो गया तो यह लापरवाही ही कही जाएगी. इस तरह के हमले केवल एक जगह प्रभाव नहीं डालते बल्कि वे दुनियाभर को प्रभावित करते हैं. हमले को धर्म के नजरिये से देखा जाता है और दूरदराज में भी इससे समाजों के बीच बेचैनी बढ़ती है. दरअसल आतंकवादी यह बेचैनी फैलाना चाहते हैं ताकि वे अपने मकसद में कामयाब हो जाएं. लेकिन ज्यादातर ऐसे लोग हैं जोे उनके मकसद को कामयाब नहीं होने देते हैं. सिडनी में बोंडी बीच पर एक हमलावर से बंदूक छीनते हुए घायल हो जाने वाले 43 साल के अहमद अल अहमद जैसे लोग समाज की उम्मीद बने हुए हैं. मगर दुनिया के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस आतंकवाद से निपटा कैसे जाए?

आतंकवाद से निपटने मे जो सबसे बड़ी बाधा है, वह है दुनिया के विभिन्न देशों का नजरिया. आप पाकिस्तान का ही उदाहरण देखिए. जो आतंकवादी भारत में उपद्रव करते हैं, वे उसकी नजर में लड़ाके हैं लेकिन आतंकवादियों का कोई समूह पाकिस्तान में उपद्रव करता है तो वह आतंकवादी है! हकीकत यह है कि दुनिया के ज्यादातर बड़े देश आतंकवाद को दो श्रेणियों में बांटते हैं. उनके लिए लाभकारी आतंकवाद और उनके लिए हानिकारक आतंकवाद. जब तक यह नजरिया कायम रहेगा, तब तक दुनिया में शांति की हम उम्मीद नहीं कर सकते.

अब जाहिर सी बात है कि इजराइल इस हमले का बदला लेगा और मामला आगे ही बढ़ते जाना है. हमास ने जब इजराइल मे जश्न मना रहे लोगों पर हमला किया था तो इजराइल ने गाजा का क्या हाल किया, यह पूरी दुनिया ने देखा. तबाह कौन हुए? गाजा के निर्दोष लोग. ये आतंकवादी तो हमला करके भाग निकलते हैं लेकिन प्रतिहमला झेलने को निर्दोष लोग मजबूर हो जाते हैं. इसलिए आतंकवाद का समूल नाश ही एकमात्र उपाय है और इसके लिए दुनिया के हर देश को एकजुट होना होगा.

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