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संतोष देसाई का ब्लॉगः फेक न्यूज की बढ़ती ताकत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: October 9, 2019 15:21 IST

फेक न्यूज की स्वीकृति की नाटकीय वृद्धि के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. लोग अब नहीं मानते कि खबरें निरपेक्ष होती हैं. 

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ठळक मुद्देखबरों को जानने के पहले यह देखा जाता है कि उसे प्रस्तुत कौन कर रहा है. पारंपरिक तौर पर मीडिया ने काफी मेहनत के बाद अपनी प्रतिष्ठा अजिर्त की है.

फेक न्यूज का सवाल दिनोंदिन गंभीर होता जा रहा है. एक तरफ जहां हमारी खबरें बनाने और प्रसारित करने की क्षमता बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर यह बता पाना भी मुश्किल हो गया है कि जो खबरें हमें मिल रही हैं या प्रसारित हो रही हैं वे सच्ची हैं या फर्जी. अत्यधिक ध्रुवीकृत समय में, प्रत्येक पक्ष के पास तथ्यों का अपना संस्करण होता है, जिसे वह पूरी शिद्दत के साथ सच मानता है. फेक न्यूज की स्वीकृति की नाटकीय वृद्धि के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. लोग अब नहीं मानते कि खबरें निरपेक्ष होती हैं. 

वे खबरों से संतुष्ट होने के बजाय उसके पीछे का आशय खोजते हैं. वे जानते हैं कि हर कोई खबरों को अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है. खबरों को जानने के पहले यह देखा जाता है कि उसे प्रस्तुत कौन कर रहा है. पारंपरिक तौर पर मीडिया ने काफी मेहनत के बाद अपनी प्रतिष्ठा अजिर्त की है. अखबार में छपने वाली खबरों के वस्तुनिष्ठ होने का लोगों को विश्वास रहता था. लेकिन डिजिटल मीडिया के आगमन के बाद खबरों के प्रति अविश्वास की भावना पैदा हुई.

लेकिन वास्तविक समस्या कहीं ज्यादा गहरी है. मनुष्य के रूप में, हमने सत्य को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया है. वस्तुस्थिति को समझने की अपेक्षा हमने अपने दृष्टिकोण से देखने को ज्यादा महत्व दिया है. हम अपने दृष्टिकोण की पुष्टि चाहते हैं. हम उन चीजों पर गुस्सा प्रकट करना चाहते हैं जो हमें परेशान करती हैं. हम आश्वस्त होना चाहते हैं कि हम जो सुन रहे हैं वही सच है. हम जानते हैं कि कभी-कभी वह सच नहीं होता, फिर भी हम उसे सच मानना चाहते हैं. 

अगर हम ध्यान दें तो कोई भी दो या अधिक व्यक्ति किसी घटना का समान रूप से वर्णन नहीं करते हैं. हर कोई अपनी तरफ से कहानी को थोड़ा अलंकृत करता है, अपने हिसाब से जोड़ता-घटाता है. और गलती हमेशा दूसरों की होती है, हमारी नहीं. हम सत्य को ढूंढ़ना नहीं उससे पलायन करना चाहते हैं. यहीं पर फेक न्यूज को पैर पसारने की जमीन मिलती है. फेक न्यूज के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि  हममें से बहुत सारे लोग उसे कोई समस्या ही नहीं मानते. हम इसकी परवाह ही नहीं करते. फेक न्यूज के प्रसार का यह बड़ा कारण है.

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